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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verses 28–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 28-31

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

मन्त्री कहेगा : हे महामते, इस त्रिलोकी में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो उद्वेग रहित (निर्वेदरहित) पुरुषप्रयत्न से उपलब्ध न हो सके । जैसे आज के सत्कर्म से कल का दुष्कर्म शोभनता को प्राप्त होता हे, मिट जाता हे वैसे ही आप उसी पौरुष प्रयत्न से प्राक्तन अधम जाति पर विजय पाकर सत्कार्यवान्‌ होइए । जो जिस पदार्थ की अभिलाषा करता है उसके लिए वह वैसा ही प्रयत्न करता है यदि वह थक कर बीच में ही निवृत्त न हो जाय तो उसे अवश्य प्राप्त करता हे । मनुष्य जैसा प्रयत्न करता है ओर तन्मय होकर जैसी भावना करता है ओर जैसा होने की इच्छा करता है वैसा ही होता है अन्यथा नहीं होता है