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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 136, Verses 6–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 136, verses 6–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 136 · श्लोक 6-11

संस्कृत श्लोक

सा तेजःपरमाणुत्वमपश्यद्वेदनावशात् । भावितार्थात्मकतया स्वप्ने त्वमिव पान्थताम् ॥ ६ ॥ परमाणुरसंवित्त्वादपश्यदणुतां स्वयम् । भास्वतीं पद्मजरजस्तुल्यां संकल्पनात्मिकाम् ॥ ७ ॥ सोच्छूनतां भावयन्ती पुनरप्यभवत्स्वयम् । चक्षुरादीनीन्द्रियाणि वपुष्यन्वभवत्स्वतः ॥ ८ ॥ अपश्यदग्रे च जगच्चक्षुरादि स्वभावतः । आधाराधेयवद्भूतमयं स्वप्नपुरं यथा ॥ ९ ॥ असुरो नाम तत्रासीत्प्राणी मानी बभूव ह । असत्यप्रतिभासात्म पितृमातृपितामहः ॥ १० ॥ दर्पोत्सिक्ततया तत्र कस्यचित्स महामुनेः । यदा मृदितवानासीदाश्रमं शर्मभाजनम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भास, जब कि देवगण आपस में उक्त वार्तालाप कर रहे थे, वे देवी के गण तृप्त होकर खाने पीने से बचे हुए वसा से पृथिवी को लीप-पोतकर उन्मत्त हो आकाश में नाचने लगे । भूतो के झुण्ड के आकाश में नाचने पर देवताओं ने पृथिवी का अवशिष्ट रुधिर अपने संकल्प से रचित एक नाले से एक सागर में भर दिया । देवताओं ने निश्चय कर उसी सागर को मदिरा का सागर बनाया | तवसे लेकर आज तक वह मदिरा का सागर बना है । वे भूत आकाश में नाचकर उस सागर की मदिरा का पान करते हैं और आनन्द मन्दिर आकाश में फिर नाचते हैँ । उन भूतो की भाँति आज-कल के भूत भी उस मदिरासागर से मदिरा पीते हैं और योगेश्वरी के गणो के साथ आकाश में नाचते है । उन भूतो के पीने से शेष रही वह वसाराशि पृथिवी में फैलकर सूख गई है, इसी कारण पृथिवी का मेदिनी नाम पड़ा हे