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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 136, Verses 1–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 136, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 136 · श्लोक 1-5

संस्कृत श्लोक

भास उवाच । अथाहं तं महादेवं पावकं पृष्टवानिदम् । शुकपक्षतिकोणस्थः भूयतामवनीश्वर ॥ १ ॥ भगवन्सर्वयज्ञेश स्वाहाधिप हुताशन । किमिदं नाम संपन्नं कथ्यतां किमिदं शवम् ॥ २ ॥ वह्निरुवाच । श्रूयतामखिलं राजन्यथावद्वर्णयामि ते । त्रैलोक्यभासुरानन्तशववृत्तान्तमक्षतम् ॥ ३ ॥ अस्त्यनन्तमनाकारं परमं व्योम चिन्मयम् । यत्रेमान्यपसंख्यानि जगन्ति परमाणवः ॥ ४ ॥ शुद्धचिन्मात्रनभसि तस्मिन्सर्वगते क्वचित् । सर्वात्मन्युदभूत्संवित्संवेदनमयी स्वयम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ चौंतीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ पैंतीसवाँ सर्ग भूत, प्रेतों के झुण्ड द्वारा शव का खा लेने ओर रुधिर पी लेने के अनन्तर वसा से पृथिवी की रचना हुई और बचे हुए रुधिर से मदिरा का सागर बनाया गया । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : उन्मत्त भूत-प्रेतों के झुण्ड ने खाने के बाद शव को जब थोड़ाबहुत बचा दिया तब दिशाओं में स्थित लोकालोक पर्वतपर बैठे हुए देवराज सहित देवताओं ने यह कहा : देवी के गणों ने वसा से सनी हुई अतएव वायुवश उड़े हुए निर्मल मेघखण्डों से व्याप्त आकाश के समान बड़ी-बड़ी आँतड़ियाँ विद्याधर ओर देवताओं के विहार के साधन विमानों की संचारभूमि में (आकाश में) भी सुखाने के लिए फैलाई हैं । देखिये, भूतो ने सातों द्रीपों मे वसा का जल बहाया है, मांस खा डाला है ओर रक्त पी लिया है, इसलिए इस समय भूमि कुछ दर्शनीय हो गई है । सब प्राणियों को आनन्द प्रदान करनेवाली पृथिवी हाय इस समय वसारूपी वस्त्रों से सारी ढकी है ओर सबके सब वन वसा के बने हुए शरत्कालिक मेघसमूहों से धूसर कम्बलो से ढके हुए से मालुम पडते हे । देखिये, उस शवकी इन हड्डियों ने महापर्वतों का रूप धारण कर लिया है । ये दिशा-तट को ढककर हिमालय की चोटियों के समान खड हैं