Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 122
एक सौ बीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इक्कीसवों सर्ग मण्डलमर्यादा की स्थापना कर अग्नि की शरण में गये हुए विपश्चितां का अग्नि के वरदान से दिगन्ता के दर्शन का उद्योग।
14 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुनायक, इसके बाद उन समुद्रतटों पर भूमिपर बैठ कर चारों विपश्चितं…
- Verse 2उस समय पद के क्रम के अनुसार निवासभूमि बनाकर उन्होने वहीं पर निवास किया ओर मजबूत मण्डलमर्य…
- Verse 3इसके बाद श्रीमान् सूर्य मानों उनके (विपश्चितं के) प्रताप का वर्णन करने के लिए समुद्र के…
- Verse 4रात्रि विस्तार को प्राप्त हुई और वे विपश्चित सारे दैनिक कृत्य पूर्ण करके सोने के लिए शय्य…
- Verse 5दूर से नदियों के प्रवाह के समान समुद्र तक पहुँचे हुए अतएव आश्चर्य में डूबे हुए उन्होने नी…
- Verse 6ओहो ! हम लोग देवाधिदेव अग्नि के प्रताप से बिना किसी क्लेश-आयास के बहुत दूर मार्ग में आ पह…
- Verses 7–8यह चारों ओर फैली हुई दृश्य शोभा कितनी विस्तृत होगी । यहाँ से जम्बूद्वीप के बाद क्षार समुद…
- Verses 9–10यह सब देखने के लिए हम श्रीअग्निदेव की प्रार्थना करे, उनके वरदान से इन सब दिशाओं को बिना प…
- Verse 11इसके अनन्तर भगवान् अग्नि उनके सन्मुख आकार धारण कर दृश्यमान हुए और उन्होंने उनसे कहा : 'ह…
- Verses 12–13विपश्चितो ने कहा : हे देवाधिदेव, पंचभूतरूप इस दृश्य का अन्त-जहोँ तक इस शरीर से जाना संभव…
- Verse 14हे प्रभो, योगप्रभाव से गम्य मार्गतक के दृश्य को हम इस देह से देखें इसके पश्चात् योगियों…
- Verse 15योगियों के योगप्रभाव से गम्य मार्ग में चल रहे हम लोगों की मृत्यु न हो, जिस मार्ग में देह…
- Verse 16श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, वर माँगने के पश्चात् बड़वानलरूप से समुद्र में…
- Verses 17–20इस तरह वर देकर अग्निदेव चले गये, तदनन्तर रात्रि आई वह भी कुछ देर ठहरकर चली गई, तदुपरान्त…