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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, Verses 12–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 122, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

जलकल्लोलमातङ्गतुङ्गिताङ्गतया तया । दधाना निजराज्येभपृष्ठरोहस्थितिश्रियम् ॥ १२ ॥ विस्तीर्णोर्मिघटापट्टपाटपट्टनपाटवैः । दर्शयन्तो जलाम्भोदनिष्क्रान्तिं मारुता इव ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

विपश्चितो ने कहा : हे देवाधिदेव, पंचभूतरूप इस दृश्य का अन्त-जहोँ तक इस शरीर से जाना संभव हो इस शरीर से, इस शरीर से अगम्य स्थान में वैदिक मन्त्रो के प्रभाव से संस्कृत इसी शरीर से, उससे अगम्य स्थान में मन से प्रत्यक्ष के योग्य सब पदार्थ, अनुमानगम्य सबपदार्थ तथा श्रुति आदि गम्य सकल पदार्थ (या सम्पूर्ण स्थूल प्रपंच, सकल सूक्ष्म प्रपंच और सकल कारण प्रपंच) । जैसे हम देखें, हे नाथ, वैसा उत्तम वरदान हमें दीजिये