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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, Verses 1–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 112, verses 1–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 1-7

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । लोकहाराम्बरव्यालं चेदिचन्दनकाननम् । छिन्नं परशुधाराभिः पतितं दक्षिणार्णवे ॥ १ ॥ पर्णवत्प्रोह्य पूरेण पारसीकाः परस्परम् । प्रहरन्तो विमोहेन विनष्टा वंजुलावने ॥ २ ॥ दर्दुराद्रौ दुरन्तेषु दरदीर्णहृदन्तराः । दरीरन्ध्रेषु संलीना दरदा दानवा इव ॥ ३ ॥ चतुरायुधधाराग्रचूर्णनीहारधारिणः । विद्युद्वलयिनो वाता वेल्लितायुधवारिदाः ॥ ४ ॥ दन्तिनोऽन्योन्यमाभग्नदन्तदेहौघपीडिताः । मृत्यूदरोम्भकग्रासपिण्डपिण्डा इवाभवन् ॥ ५ ॥ तज्जा रैवतिका रात्रौ रौद्रतोमरताडिताः । रूपिकाभिः पिशाचीभिर्भुक्ता भागीकृताङ्गकाः ॥ ६ ॥ तालीतमालगहने दशार्णा जीर्णजङ्गले । गले पादं निधायान्तः कृत्ताः सिंहैर्गतासवः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इस प्रकार प्रलयतुल्य घमासान युद्ध चल रहा था, संग्राम भूमि में सेनाएँ हार और जीत रही थीं, तूरी, रणसिंगा और महाशंखों की ध्वनियाँ प्रतिध्वनि द्वारा आकाश में बज रही थीं, आकाश में तलवार सरसराहट के साथ बोल रही थीं, वीरो के धनुषो की दीर्घ टकार ध्वनियाँ हो रही थीं, योद्धागण परस्पर जोर-शोर से ताल ठोक रहे थे, निर्दयता से कूटे (पीटे) हुए कवच जोर के कट-कट शब्द कर रहे थे, राजा विपश्चित्‌ की सेनाएँ कुछ हार-सी रही थीं, काटी जा रही लताओं की भाँति सेना का बहुत बड़ा भाग मूर्छित हो रहा था, इतने में राजा विपश्चित्‌ के रणभूमि प्रयाण की दुन्दुभि, जो वजयुक्त प्रलयकालीन मेघकी-सी ध्वनि से पूर्ण थी, दिशाओं को अपनी ध्वनि से पूर्ण करती हुई बजी । उक्त दुन्दुभि-ध्वनि एक साथ टूट रहे कुलपर्वतों की ध्वनि के समान प्रचण्ड थी, उसने प्रकट हो रही अपनी गड़गड़ाहट से सकल दिकृतटों को स्तब्ध कर दिया था। वह राजा विपश्चित्‌ भगवान्‌ श्रीविष्णुजी की सदेह भुजा जैसे चार शरीरो से रणभूमि के लिए चौतरफा निकला

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ दसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ ग्यारहवाँ सर्म अपनी सेना की हार होते न होते रणभूमि के लिए निकले हुए राजा द्वारा वायव्यास्त्रों से चारों ओर शत्रुओं के संहार का वर्णन।