Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 89, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 89, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
मुक्तोऽस्मि शस्त्रनिगडादिति तुष्टो हि वारणः ।
दूरस्थोऽपि पुनर्बद्धो मौर्ख्यं क्व च न बाधते ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक सव दुःखो का मूल अज्ञान नष्ट नहीं होता, तब तक सैकड़ों प्रयत्नो से किया गया दुःख
विनाश भी व्यर्थ ही है, इस आशय से कहते है ।
मैं श्रृंखलाबन्धन से निर्मुक्त हो गया, इस बुद्धि से सन्तुष्ट हुआ हाथी दूर भाग जाने पर भी फिर
अज्ञान के कारण बन्धन में पड़ गया । मूर्खता कहाँ बाधा नहीं पहुँचाती अर्थात् सर्वत्र बाधा पहुँचाती
ही है