Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 88
सत्तासीवाँ सर्ग समाप्त अट्ञासीवाँ सर्ग चिरकाल की तपस्या से प्राप्त हुए चिन्तामणि को किसी ने अपनी मूर्खता से छोडकर मणि की भ्रान्ति से काँच को अपनाया, यह कथा |
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- Verse 1चूडाला ने कहा : कोई एक श्रीमान् पुरुष था । वह अनादि काल से ही एक दूसरे के स्थान में न रह…
- Verse 2वह चौसठ कलाओं से पूर्ण था, अ्त्रविद्या में पटु था, व्यवहारशास्त्र में विचक्षण था और संकल्…
- Verses 3–15निर्विघ्नतापूर्वक बड़ी भारी सामर्थ्य प्राप्त करता हे । सामने उपस्थित हुए हाथ से ग्रहण करन…
- Verses 16–17उसने क्यो नहीं यत्न किया, इस पर कहते है । जो वस्तु जिस समय जिसको प्राप्त होने योग्य नहीं…
- Verse 18आपने तो कथा के आरम्भ में कहा था कि वह पुरुष व्यवहार मेँ निपुण था, फिर मणिप्राप्तिकाल में…
- Verses 19–26वह पुरुष फिर चिन्तामणि के साधन में कर्म और यत्न करने लगा, क्योकि अटल निश्चयवाले लोग अपने…
- Verse 27इन सव बातों से यह निष्कर्ष निकला कि एकमात्र मूर्खता ही दुःख में सबसे बढ़-चढ़कर कारण है, ऐ…