Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 88, Verses 19–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 88, verses 19–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 19-26
संस्कृत श्लोक
पुमान्भूयः क्रियायत्नं चक्रे रत्नेन्द्रसाधने ।
नोद्विजन्ते स्वकार्येषु जना अध्यवसायिनः ॥ १९ ॥
ददर्शाथ कचद्रूपं काचखण्डमखण्डितम् ।
हसद्भिर्वञ्चकैः सिद्धैः पुरस्कृतमलक्षितैः ॥ २० ॥
अयं चिन्तामणिरिति मूढस्तस्मिन्स वस्तुताम् ।
बुबुधे मोहितो ह्यज्ञो मृदं हेमेति पश्यति ॥ २१ ॥
अष्टौ षष्ठं द्विषं मित्रं रज्जुं सर्पं स्थलं जलम् ।
चन्द्रौ द्वौ कुरुते चित्तगतो मोहोऽमृतं विषम् ॥ २२ ॥
तं दग्धमणिमादाय प्राक्तनीं च श्रियं जहौ ।
सर्वं चितामणेरस्मात्प्राप्यते किं धनैरिह ॥ २३ ॥
देशोऽयमसुखो रूक्षो जनैः पापिभिरावृतः ।
किं तद्गेहं गतप्रायं किं नाम मम बन्धवः ॥ २४ ॥
दूरं गत्वा यथाकामं सुखं तिष्ठामि संपदा ।
इत्यादाय मणिं मूढः शून्यकाननमाययौ ॥ २५ ॥
तत्र काचकणेनासौ तेन तामापदं ययौ ।
कज्जलाद्रेरिव निभा मौर्ख्यस्यैवाङ्ग या समा ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
वह पुरुष फिर चिन्तामणि के
साधन में कर्म और यत्न करने लगा, क्योकि अटल निश्चयवाले लोग अपने कार्यों में उद्वेग नहीं प्राप्त
करते । तदनन्तर चमकीले रूप से युक्त अखण्डित काँच का एक टुकड़ा उसने देखा | वह टुकड़ा
परिहास में तत्पर वंचक अलक्षित सिद्धों ने उसके सामने रख दिया था | यही चिन्तामणि है, ऐसा
निश्चय कर उस अज्ञानी पुरुष ने उसमें उपादेयता जान ली, क्योंकि मोहग्रस्त अज्ञानी मिट्टी को सोने
के रूप में देखता है। हे साधो, चित्त में रहनेवाला मोह किसी समय आठ पदार्थों को छः; शत्रु को मित्र,
डोरी को सर्प, स्थल को जल, एक चन्द्र को दो चन्द्र और अमृत को विष बना देता है । उस दरिद्र मणि
को लेकर उसने अपनी पूर्व की सारी सम्पत्ति छोड़ दी, क्योंकि मोहवश उसने यह समझ लिया कि अब
इस चिन्तामणि से ही सब कुछ प्राप्त हो जायेगा, इन सम्पत्तियों से क्या प्रयोजन । यह देश, सुख से
शून्य, स्नेहीजनों से रहित और पापात्मा जीवों से आक्रान्त है, जीर्ण-शीर्ण वह घर भी निष्प्रयोजन है
और मेरे बन्धु भी क्या हैं यानी इनसे क्या प्रयोजन हे । अब तो दूर जाकर यथेच्छ सुखपूर्वक सम्पत्तियों
से युक्त होकर रहूँगा, यों विचारकर उस काँचखण्ड को लेकन निर्जन अरण्य में वह मूढ चला आया । हे
प्रिय, वहाँ जंगल में जाकर उस काँच के खण्ड से वह मूढ ऐसी विपत्ति में फेस गया, जो कज्जल पर्वत
की कान्ति के सदृश गहरी नीलिमा से युक्त ओर मूर्खता के अनुरूप थी