Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 88, Verses 3–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 88, verses 3–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 3- 15
संस्कृत श्लोक
अनन्तयत्नसंसाध्ये स चिन्तामणिसाधने ।
प्रवृत्तो वाडवो वह्निरब्धिसंशोषणे यथा ॥ ३ ॥
तस्य यत्नेन महता कालेनाध्यवसायिनः ।
सिद्धश्चिन्तामणिः किंवा न सिद्ध्यत्युद्यतात्मनाम् ॥ ४ ॥
प्रवृत्तिमुद्यमं प्रज्ञां प्रयुंक्ते चेदखेदवान् ।
अकिंचनोऽपि शक्तत्वं समवाप्नोत्यविघ्नतः ॥ ५ ॥
मणिमग्रे स्थितप्रायं हस्तप्राप्यं ददर्श सः ।
मेरावुदयश्रृङ्गस्थो मुनिरिन्दुमिवोदितम् ॥ ६ ॥
बभूव मणिराजेन्द्रे न तु निश्चयवानसौ ।
राज्ये द्रागिति संप्राप्ते सुदीन इव पामरः ॥ ७ ॥
इदं संचिन्तयामास मनसा स्मयशालिना ।
संप्राप्तोपेक्षया दीर्घदुःखसंभ्रमशालिना ॥ ८ ॥
अयं मणिर्मणिर्नायं मणिश्चेत्तद्भवेन्न सः ।
स्पृशामि न स्पृशाम्येनं कदाचित्स्पर्शतो व्रजेत् ॥ ९ ॥
नैतावतैव कालेन मणीन्द्रः किल सिद्ध्यति ।
यत्नेन जीवितान्तेन सिद्ध्यतीत्यागमक्रमः ॥ १० ॥
कृपणः कूणितेनाक्ष्णा लोलालातलतोपमम् ।
रत्नालोकं प्रपश्यामि द्विचन्द्रत्वमिव भ्रमात् ॥ ११ ॥
कुत एतावती स्फीता भाग्यसंपन्ममागता ।
अधुनैव यदाप्नोमि मणीन्द्रं सर्वसिद्धिदम् ॥ १२ ॥
केचिदेव महान्तस्ते महाभाग्या भवन्ति हि ।
येषामल्पेन कालेन भवन्त्यभिमुखाः श्रियः ॥ १३ ॥
अहमल्पतपाः साधुवराको मानुषः किल ।
सिद्धयः कथमायान्ति मामभाग्यैकभाजनम् ॥ १४ ॥
एवं विकल्पसंकल्पैश्चिरमज्ञः परामृशन् ।
न मणिग्रहणे यत्नमकार्षीन्मौर्ख्यमोहितः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्विघ्नतापूर्वक बड़ी भारी सामर्थ्य प्राप्त करता हे । सामने उपस्थित हुए हाथ से ग्रहण करने योग्य
चिन्तामणि को उसने उस प्रकार देखा, जिस प्रकार मेरु पर्वत पर उदय शिखर के ऊपर स्थित मुनि
उदित चन्द्रमा को | बड़े-बड़े मणिराज के ईश्वर उस चिन्तामणि के विषय में यह उस प्रकार निश्चय न
कर सका, जिस प्रकार दरिद्रतम पामर तत्काल प्राप्त राज्य के विषय में निश्चय नहीं कर सकता ।
दीर्घकाल के दुःख से भ्रान्त तथा विस्मय से युक्त मन से-प्राप्त भी चिन्तामणि की उपेक्षा कर-उसने
यह विचार किया । क्या यह चिन्तामणि है या चिन्तामणि नहीं हे । यदि चिन्तामणि होता, तो मुझे वह
प्रत्यक्ष ही नहीं होता । क्या मैं इसे छूठँ या न छूऊँ ? यदि मैं इससे छू जाऊ, तो भाग्यहीन मेरे स्पर्श से
यह अदृश्य हो जायेगा । इतने थोड़े समय में ही मणियों का राजा चिन्तामणि सिद्ध नहीं हो सकता,
क्योकि इतिहास परम्परा यही है कि जीवनपर्यन्त यत्न करने से ही चिन्तामणि सिद्ध होता हे । मेँ कृपण
हूँ, इसलिए भ्रान्तिसंकुचित नेत्र से चंचल अलातचक्र में कल्पित लता के सदृश रत्नप्रकाश को, भ्रम से
दो चन्द्रमा की नाई, देखता हू । मेरी इतनी विशुद्ध भाग्यसम्पत्ति ही कहाँ से आयी, जिससे मैं समस्त
सिद्धियों के दाता चिन्तामणि को इतने थोडे समय में ही प्राप्त कर लू । थोड़े ही ऐसे बड़े भाग्यवान्
महात्मा होते हैं, जिनके सामने सम्पत्तियाँ स्वल्प समय में उपस्थित हो जाती हैं । मेँ तो साधारण ही
तपवाला हूँ, साधुओं में तुच्छ मनुष्य हूँ, इसलिए भाग्यरहित मेरे यहाँ सिद्धिर्योँ केसे आ सकती हे । इस
प्रकार संकल्प-विकल्पो से दीर्घकाल तक विचारविमर्शं कर रहे उस अज्ञानी पुरुष ने मूर्खता से मुग्ध
होकर मणि लेने में कुछ भी यत्न नहीं किया