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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 86

6 verse-groups

  1. Verse 1पचासीवाँ सर्म समाप्त छियासीवाँ सर्ग कुम्भ से कुम्भ की उत्पत्ति, वृद्धि, ब्रह्मा के साथ उस…
  2. Verse 2हे मुने, अनेक तरह की ये जो वासनाएँ हैं, उनका विनाश कर देने से प्राणी धर्म या अधर्म के फंद…
  3. Verses 3–12प्रतिबिम्ब के सदृश बढ़ने लगा
  4. Verses 13–18समय पाकर उस घटने कमलपत्र के सदृश नेत्रवाले गर्भ का उस प्रकार प्रसव किया, जिस प्रकार पूर्ण…
  5. Verses 19–27अनन्तर वे नारदजी अपने पुत्र को लेकर ब्रह्मलोक में गये ओर अपने पिता ब्रह्माजी को उससे अभिव…
  6. Verses 28–29अव अपनी उक्ति का उपसंहार करते हैँ । वनवास के गुणों को तथा उसके फल चित्तशुद्धि को जाननेवाल…