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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 86, Verses 19–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 86, verses 19–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 19-27

संस्कृत श्लोक

अथैनं पुत्रमादाय ब्रह्मलोकं स नारदः । जगामाथ स्वपितरं ब्रह्माणं चाभ्यवादयत् ॥ १९ ॥ कृताभिवन्दनं ब्रह्मा पौत्रमादाय तं तदा । अभिवादितवेदादिं स्वयमङ्के न्यवेशयत् ॥ २० ॥ अथाशीर्वादमात्रेण सर्वज्ञं ज्ञानपारगम् । पौत्रं तं कुम्भनामानं चकार कमलोद्भवः ॥ २१ ॥ साधो सोऽहमयं कुम्भः पौत्रोऽहं पद्मजन्मनः । पुत्रोऽहं नारदमुनेः कुम्भनामास्मि कुम्भजः ॥ २२ ॥ निवसाम्यब्जजपुरे पित्रा सह यथासुखम् । चत्वारः सुहृदो वेदा मम लीलाविलासिनः ॥ २३ ॥ मातृष्वसा मे गायत्री मम माता सरस्वती । ब्रह्मलोके मम गृहं पौत्रस्तत्रास्मि सुस्थितः ॥ २४ ॥ यथाकाममशेषेण जगन्ति विहराम्यहम् । लीलया परिपूर्णत्वान्न तु कार्येण केनचित् ॥ २५ ॥ धरां पतति मे पादौ पततो न महीतले । रजः स्पृशन्ति नाङ्गानि ग्लानिं नायाति मे वपुः ॥ २६ ॥ अद्याकाशपथा गच्छन्दृष्टवांस्त्वामहं पुरः । इह तेनागतोऽस्म्यङ्ग सर्वं कथितवानिति ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

अनन्तर वे नारदजी अपने पुत्र को लेकर ब्रह्मलोक में गये ओर अपने पिता ब्रह्माजी को उससे अभिवादन कराया । अभिवादन कर चुके पौत्र को ब्रह्माजी ने लेकर उससे सब वेदादि शास्त्रों के विषय में परीक्षार्थ प्रश्न पूछे उनका समुचित उत्तर सुनकर उसे अपनी गोद में स्वयं बैठा लिया । तदनन्तर ब्रह्माजी ने उस कुम्भनामक पौत्र को केवल आशीर्वाद से सर्वज्ञ ओर तत्त्वज्ञान मेँ परिनिष्ठित बना डाला हे साधो, वह जो ब्रह्माजी का पोत्र कुम्भ हुआ, वही यह तुम्हारे सामने उपस्थित हे । मैं ही नारदजी का पुत्र कुम्भ नाम का हूँ ओर कुम्भ से उत्पन्न हुआ हूँ। साधो, मैं ब्रह्मलोक में पिताजी के साथ सब सुखो से पूर्ण होकर रहता हूँ | क्रीडा के समय विलास कर रहे चार वेद मेरे मित्र हैं | मेरी मौसी गायत्री है मेरी माँ सरस्वती हे, मेरा घर ब्रह्मलोक में है, वहीं भगवान्‌ ब्रह्मा का पोत्र होकर मैं सुस्थिर रहता हूँ । इच्छा के अनुसार सब लोक में मैं विहार करता हूँ। सब इच्छाओं से परिपूर्ण होने के कारण घूमने में मेरा प्रयोजन केवल लीला ही है । किसी कार्यविशेष से मैं विहार नहीं करता । जब मैं भूलोक में विचरण करता हूँ तब मेरे पैर भूमि में नही लगते, अंग धूलिकणों का स्पर्श नहीं करते और मेरा शरीर कभी ग्लानि नहीं करता | हे प्रिय, आज मैं जब आकाशमार्ग से जा रहा था, तब मैंने आपको सामने देखा, इसलिए यहाँ मैं आ गया और आप से पूर्व का सब वृतान्त कहा