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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 84, Verses 31–62

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 84, verses 31–62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 31-62

संस्कृत श्लोक

भवत्या पालयन्त्येह राज्ये स्थातव्यमुत्तमे । कुटुम्बभारोद्वहनं पत्यौ याते व्रतं स्त्रियः ॥ ३१ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा दयितां राजा तामिन्दुवदनां वशी । उत्तस्थौ स्नातुमखिलं दिनकार्यं चकार च ॥ ३२ ॥ अथोज्झितप्रजाचेष्टो रविरस्ताचलं ययौ । शिखिध्वजो वनमिव समस्तजनदुर्गमम् ॥ ३३ ॥ संहृत्य विततं रूपं तमेवानुययौ प्रभा । नाथं भवननिष्क्रान्तं चूडालेवानुरागिणी ॥ ३४ ॥ आययौ यामिनी श्यामा भुवनं भस्मधूसरम् । धृतव्योमापगं शर्वं संश्लेषा यमुनेव सा ॥ ३५ ॥ दिक्षु संध्याब्ददन्तासु स्थितासु कृतमण्डलम् । तमालबालकाङ्कासु ज्योत्स्नाहासोदयाङ्कितम् ॥ ३६ ॥ गच्छतोरपरं पारं दंपत्योर्मैरव पदम् । देवोद्यानमयं रन्तुं दिनश्रीदिननाथयोः ॥ ३७ ॥ आगच्छतोरिदं पारं ह्यघतीक्ष्णकरोज्झितम् । निशानिशानायकयोर्दंपत्योर्मैरवं पुनः ॥ ३८ ॥ तारागणोऽथ ददृशे विकीर्णो व्योमकुट्टिमे । मुक्तो मङ्गललाजानां दिग्वधूभिरिवाञ्जलिः ॥ ३९ ॥ चन्द्रानना तमःश्यामा श्रान्ता कुसुमहासिनी । यामिनी यौवनं प्राप सरोजमुकुलस्तनी ॥ ४० ॥ कृतसंध्यासमाचारः सहचूडालयेष्टया । सुष्वाप शयने भूयो मैनाक इव सागरे ॥ ४१ ॥ अथार्धरात्रसमये देशे निःशब्दतां गते । घननिद्राशिलाकोशनिलीने सकले जने ॥ ४२ ॥ स तस्यां संप्रसुप्तायां शयने कोमलांशुके । भृशं निद्राविमूढायां भ्रमर्यामिव पङ्कजे ॥ ४३ ॥ तत्याज दयितां सुप्तामङ्काद्राजा शिखिध्वजः । स्वैरं स्वैरं मुखं राहोर्दिशं चान्द्रप्रभामिव ॥ ४४ ॥ उत्तस्थौ शयनाल्लीनवधूकार्धाञ्चलांशुकात् । सलक्ष्मीकान्तिलोलोर्मेर्हरिः क्षीरार्णवादिव ॥ ४५ ॥ वीरक्रमार्थं यामीति तत्रैवानुचरव्रजम् । योजयित्वा जगामासौ पुरान्निर्गत्य पूर्णधीः ॥ ४६ ॥ राज्यलक्ष्मि नमस्तुभ्यमित्युक्त्वा मण्डलाद्गतः । विवेशोग्रामरण्यानीमेको नद इवार्णवम् ॥ ४७ ॥ घनान्धकारगुल्माढ्या क्षुद्रभूतौघकर्कशा । सारण्यानी निशा सार्धं समं तेनातिवाहिता ॥ ४८ ॥ प्रातः शून्यामरण्यानीं स नीत्वा विततं दिनम् । सममर्केण कस्यांचिद्विशश्राम वनावनौ ॥ ४९ ॥ भानावदृश्यतां याते तत्र स्नानादिपूर्वकम् । किंचित्फलादिकं भुक्त्वा तां निनाय तमस्विनीम् ॥ ५० ॥ पुनः प्रातः पुराण्युच्चैर्मण्डलानि गिरीन्नदीः । जवादुल्लङ्घयामास राजा द्वादशशर्वरीः ॥ ५१ ॥ ततो मन्दरशैलस्य तटस्थं जनदुर्गमम् । प्राप काननमत्यन्तदूरस्थजनतापुरम् ॥ ५२ ॥ रटत्प्रणालसलिलवापीवलितपादपम् । शीर्णवेद्यालयज्ञातभूतपूर्वद्विजाश्रमम् ॥ ५३ ॥ क्षुद्रप्राणिविनिर्मुक्तसिद्धसेव्यलतालयम् । आपूर्णपादपलतं प्राणवृत्तिक्ररैः फलैः ॥ ५४ ॥ तत्रैकस्मिन्समे शुद्धे स्थले सलिलमालिते । शीतले शाद्वलश्यामे स्निग्धे सफलपादपे ॥ ५५ ॥ समञ्जरीभिर्वल्लीभिः स चकारोटजालयम् । प्रावृट्कालः सविद्युद्भिर्नीलाभ्रैरिव पञ्जरम् ॥ ५६ ॥ मसृणं वैणवं दण्डं फलभोजनभाजनम् । अर्घपात्रं पुष्पभाण्डमक्षमालां कमण्डलुम् ॥ ५७ ॥ कन्थां शीतापनोदाय बृसीं चैव मृगाजिनम् । आनीयायोजयत्तस्मिन्मठिकामन्दिरे नृप ॥ ५८ ॥ यत्किंचिदन्यद्वा वस्तु योग्यं तापसकर्मणि । तत्तत्र स्थापयामास जगतीव क्रमं विधिः ॥ ५९ ॥ संध्यापूर्वं जपं प्रातः प्रहरे स तदाकरोत् । पुष्पोच्चयं द्वितीये तु स्नानं देवार्चनं ततः ॥ ६० ॥ पश्चाद्वनफलं किंचिद्वनकन्दं विसादि च । भुक्त्वा जप्यपरो भूत्वा निनायैको निशां वशी ॥ ६१ ॥ इति दिवसमखेदं मन्दरोपान्तकच्छे विरचित उटजेऽन्तर्मालवेशो निनाय । नवनृपतिविलासं तं न सस्मार कं वा स्फुरति हृदि विवेके राज्यलक्ष्म्यो हरन्ति ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह जो तुमने कहा है कि समय प्राप्त हुए बिना प्रजापालन का त्याग करनेवाले राजाओं को राज्यविनाशनिपित्तक बहुत बडा पाप लगेगा सो इस दोष का परिहार भी तुम्हे ही करना पड़ेगा, इस अभिप्राय से कहते हैं। हे उत्तमे, प्रजाओं का भलीर्भोति पालन करती हुई तुम राज्य मेँ स्थित रहना, क्योकि पति के चले जाने पर कुटुम्ब के भार का उद्वहन करना स्त्रियों का धर्म हे । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, शशिमुखी उस अपनी दयिता से इतनी बातें कहकर जितेन्द्रिय राजा शिखिध्वज स्नान करने के लिए उठ गया ओर उसने अपने सम्पूर्णं दैनिक कार्यो का सम्पादन किया । इसके अनन्तर सब प्रजाओं की चेष्टाओं का त्यागकर भगवान्‌ सूर्य अस्ताचल को उस तरह चल पडे, जिस तरह राजा शिखिध्वज अपनी सम्पूर्ण प्रजाओं की चेष्टाओं का त्यागकर समस्त जनों से दुर्गम जंगल को । अपने व्यापक रूप का उपसंहार कर अनुरागिणी प्रभा भी भगवान्‌ सूर्य के पीछे-पीछे उस तरह चली गयी, जिस तरह राजमहल से निकले हुए अपने स्वामी के पीछे-पीछे अनुरागिणी चूडाला । भस्म से (धूलि से) धूसर भुवन के पास श्यामा (काली) रात्रि उस प्रकार आ गयी, जिस प्रकार अपनी प्रियसखी गंगा को धारण किये हुए भगवान्‌ शंकर के पास स्वयं काम से वशीभूत होकर आलिंगन करने की इच्छा से मानों यमुना आ गयी हो। सब दिशाओं के-सन्ध्याकालीन मेघरूप दाँतों से युक्त तथा तमालरूपी बच्चों को अपनी गोद में लेकर यमुना के चरित्र के अवलोकन से मानों चाँदनीरूपी हास से समन्वित तथा चारों ओर घेरा बाँधकर-स्थित होने पर, दिनश्री ओर दिननाथरूपी दम्पतियों के देवताओं के उद्यानमय मेरु पर्वत के उत्तरार्धं में रमण करने के लिए चले जानेपर तथा धर्मरूपी पापों एवं तन्निमित्तक तीक्षण किरणों से त्यक्त निशा ओर निशानायकरूपी दम्पतियों के मेरु पर्वत के इस पार में विहार करने के लिए आ जाने पर, दिशारूपी स्त्रियों द्वारा फेंकी गयी मांगलिक लावो की नाई, आकाशरूपी फर्श के (गच के) ऊपर बिखरे हुए तारों के गण दीख पड़े । चन्द्ररूपी आनन से सुशोभित, अन्धकार से श्यामवर्णा, अपने प्रिय चन्द्र के अन्वेषण तथा उनके उदय की प्रतीक्षा से श्रान्त हुई, कुमुद आदि कुसुमां से हासवती तथा रात्रि कमल रूपी स्तनों से सुशोभित रात्रि अपनी युवावस्था के फल को प्राप्त हुई । सन्ध्याकालीन सब कार्यो का सम्पादन करके वह राजा शिखिध्वज अपनी प्रिय-पत्नी चूडाला के साथ शयनस्थान में उस तरह गाढ सो गया, जिस तरह मैनाक पर्वत समुद्र में इसके बाद आधी रात के समय जब राजा सारा देश निःशब्दता को प्राप्त हो गया तथा जब सघननिद्रारूपी पाषाणकोश के भीतर सकल जन विलीन हो गये, तब उस राजा शिखिध्वज ने, कमल के ऊपर सोई हुई निद्रा से अत्यन्त विमूढ भ्रमरी के समान, कोमल वस्त्रं से सुसज्जित पलंग पर सोई हुई उस चूडाला के निद्रा से अत्यन्त विमूढ हो जाने पर धीरे- धीरे अपनी गोद से सोई हुई प्रिया को उस तरह त्याग दिया, जिस तरह राहु का मुख पूर्व दिशा में चन्द्रमा की प्रभा को। वह राजा उस पलंग से, जिसके ऊपर बिछाये गये चादर के आधे हिस्से पर उसकी प्रिय पत्नी गाढ निद्रा मे सोई हुई थी, उस तरह उठ गया; जिस तरह लक्ष्मी की कान्तियों से युक्त चंचल तरंगों से समन्वित क्षीरसागर से भगवान्‌ विष्णु उठ जाते हैं। चोर आदि दुष्ट लोगों को पकड़ने के लिए “मैं बाहर जा रहा हूँ” यह कहकर तथा अपने अनुचरों को भी उसी कार्य में नियुक्त करके वह निःस्पृह राजा शिखिध्वज नगर से निकलकर चल दिया । हे राजलक्षिम, तुम्हें नमस्कार है, यों कहकर वह अकेला अपने मण्डल से चला और चलते-चलते एक भयंकर बहुत बड़े जंगल में उस तरह प्रविष्ट हो गया, जिस तरह, नद महासमुद्र में घनान्धकार ओर गुल्मो से पूर्ण तथा क्षुद्र जीवो से अत्यन्त कर्कश उस बड़े जंगल तथा रात्रि को उसने साथ-साथ पार किया । ओर सवेरा होने पर वह उस शून्य बडे जंगल में खूब चलता रहा । चलते-चलते सम्पूर्ण विस्तृत दिन गँवाकर भगवान्‌ सूर्यदेव के साथ ही कहीं जंगल की भूमि में उसने विश्राम किया । भगवान्‌ भास्कर के अदृश्य हो जाने पर वहाँ स्नान, सन्ध्यावन्दन आदि कर लेने के बाद कुछ फलादि खा करके उसने वह रात गँवा दी । फिर प्रातःकाल होने पर बड़े वेग से चलता हुआ वह राजा शिखिध्वज बड़े-बड़े नगरों, मण्डलो, पर्वतो तथा नदियों को बारह दिन में लाँघ गया | तदनन्तर वह मन्दराचल के तट पर स्थित मनुष्यों से दुर्गम एक वन में पहुँचा, जहाँ से जनसमूह ओर नगर बहुत ही दूर स्थित थे । जहाँ पर वापियो द्वारा, जिससे बाँसों की नालियों से शब्दपूर्वक जल बह रहे थे, अत्यन्त बलवान्‌ बनाये गये असंख्य वृक्ष उपस्थित थे; जहाँ पर जीर्णशीर्ण वेदियों और घरों से सहज में यह अनुमान हो रहा था कि यहाँ पर पहले ब्राह्मणों के अवश्य ही अनेक आश्रम थे। ओर जो क्षुद्र जन्तुओं से शून्य, सिद्ध लोगों से सेवनीय, लताघरों से समन्वित तथा प्राणवृत्ति करनेवाले फलों से नीचे से ऊपरतक परिपूर्ण वृक्षों ओर लताओं से भरा हुआ था । उसी जंगल में किसी एक चोरस, शुद्ध, जल से वेष्टित, शीतल, हरे-हरे घासो से युक्त प्रदेशों से श्याम, स्निग्ध, तथा फलसम्पन्न वृक्षों से युक्त स्थान मेँ मंजरीसहित लताओं से उस राजा ने एक पर्णशालारूपी घर उस तरह बनाया, जिस तरह वर्षाकाल बिजलीसहित नील मेघो से पजर बनाता हे । बाँस का दण्ड, फल- भोजन पात्र, अर्घपात्र, पुष्पपात्र, कमण्डलु, रूद्राक्ष की माला, शीत से अपनी रक्षा के लिए कन्था, और व्रतियों का आसन मृगचर्म-ये सब वस्तुएँ लाकर उस राजा ने अपने मठिकारूपी मन्दिर में सजा दीं । इनके अतिरिक्त ओर भी दूसरी कोई वस्तु, जो तापसकर्मोपयोगी मालूम पडी, राजा ने लाकर अपनी कुटिया में उस तरह स्थापित की, जिस तरह विधाता अपने द्वारा सृष्ट ब्रह्माण्ड मेँ व्यवहार-साधनों को स्थापित करता हे । उसने दिन के प्रथम प्रहर में प्रातःकाल सन्ध्यापूर्वक जप, द्वितीय प्रहर में पुष्प आदि का संचय और उसके बाद स्नान, देवार्चन आदि कार्य किये । तदनन्तर जंगली फल, कन्दमूल तथा कमलदण्डादि खाकर जप में तत्पर होकर जितेन्द्रिय उस राजा ने अकेले रात बितायी। हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह मन्दराचल के तट पर विरचित पर्णशाला के भीतर स्थित उस मालवेश शिखिध्वज ने खेदशून्य होकर जपादि करते हुए अनेक दिन बिता दिये । उसने पूर्वानुभूत अपने नूतन राजविलासों का तनिक भी स्मरण नहीं किया, क्योकि हृदय में विवेक के स्फुरित होने पर राज्यलक्षिमयाँ ईच्छा की उत्पत्ति के द्वारा क्या किसी दरिद्र को भी अपने वश में कर सकती हैं ? तात्पर्य यह कि वे किसी भी विवेकी को वश में नहीं कर सकतीं