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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 84, Verses 22–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 84, verses 22–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 22-27

संस्कृत श्लोक

चूडालोवाच । प्राप्तकालं कृतं कार्यं राजते नाथ नेतरत् । वसन्ते राजते पुष्पं फलं शरदि राजते ॥ २२ ॥ जराजरठदेहानां युक्तो वनसमाश्रयः । न यूनां त्वादृशामेव तेनैतन्मे न रोचते ॥ २३ ॥ यौवनेन महाराज न यावद्वयमुज्झिताः । पुष्पौघेणेव तरवस्तावच्छोभामहे गृहे ॥ २४ ॥ पुष्पधाना पुष्पमितजरसा सह काननम् । समं गृहाद्गमिष्यामो हंसा इव सरोवरात् ॥ २५ ॥ अप्राप्तकालं नृपतेः प्रजापालनमुज्झतः । राजन्यस्यैव रन्ध्रस्य महदेनो भविष्यति ॥ २६ ॥ अप्राप्तकारिणं भूपं रोधयन्ति च वै प्रजाः । रोधयन्ति ह्यकार्येभ्यः प्रभुं भृत्याः परस्परम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

पति को वैराग्य दृढ़ हुआ है या नहीं, इसकी परीक्षा कर रही चूडाला पहले की कामासक्त का ही, अवस्थानुरूपता वर्णन द्वारा मानो अनुमोदन करती हुई स्थूणानिखनन न्याय से, निरास करती है । चूडाला ने कहा : हे नाथ, जिसके लिए समय आ चुका हो वही कार्य यदि किया जाय तो शोभित होता हे, दूसरा नहीं । फूल वसन्त में ही शोभता है ओर फल शरत्काल में ही भला लगता हे । वृद्धावस्था से ठिठुरे हुए शरीरवाले पुरुषों के लिए ही वन का आश्रय लेना युक्त है, परन्तु आपके सदश युवकों के लिए कदापि युक्त नहीं है, इसलिए आपका यह विचार मुझे पसन्द नहीं हँ । महाराज, पुष्पसमूहों से वृक्षों की नाई जब तक हम लोग यौवन से त्यक्त नहीं होते, तब तक घर में ही शोभित रहें -निवास करे । पुष्पों को धारण करनेवाली लताओं के मस्तक पर झूम रहे सफेद फूलों से उपमित बुढापा के साथ यानी वृद्धावस्था आने पर जब हम दोनों के मस्तक के केश पुष्पयुक्त लताओं के समान बिलकुल सफेद हो जायेंगे, तब हम दोनों एक ही साथ, सरोवर से हंसों की नाई, गृह से निकलकर जंगल में चलेगे । हे राजन्‌, बिना समय आये प्रजापालन का त्याग कर रहे राजा को राज्यविनाशनिमित्तक बहुत बड़ा पाप लगेगा ही । समयप्राप्ति के बिना कार्य करने वाले राजा को प्रजाएँ अवश्य ही रोकती हैं और अकार्यो से नौकर अपने स्वामी को तथा स्वामी नौकरों को, यों परस्पर रोकते ही हें