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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 84, Verses 15–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 84, verses 15–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 15-21

संस्कृत श्लोक

स्तबकस्तनधारिण्यो रक्तपल्लवपाणयः । मञ्जरीजालहारिण्यो लोलशुभ्राम्बुदांशुकाः ॥ १५ ॥ स्वपरागाङ्गरागिण्यः कृतकौसुममण्डनाः । आसेव्यकाञ्चनशिलानितम्बतटशोभिताः ॥ १६ ॥ तरङ्गमौक्तिकप्रोतसरिन्मुक्तालतावृताः । लतावयस्यावलिता मुग्धमुग्धमृगात्मजाः ॥ १७ ॥ स्वभावोद्दामसौगन्ध्या वितीर्णफलभोजनाः । षट्पदश्रेणिनयनाः पुष्पापूरलताङ्गिकाः ॥ १८ ॥ आस्वाद्यस्यन्दतां याताः शीतलामलगात्रिकाः । रमयन्ति त्वमिव मां वनवीथ्यो वरानने ॥ १९ ॥ यथा विविक्तमेकान्ते मनो भवति निर्वृतम् । न तथा शशिबिम्बेषु न च ब्रह्मेन्द्रसद्मसु ॥ २० ॥ अस्मिन्सन्मन्त्रणे तन्वि न विघ्नं कर्तुमर्हसि । भर्तुर्विघटयन्तीच्छां न स्वप्नेऽपि कुलस्त्रियः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

अब वनराजि का चूडाला की उपमा से वर्णन करते हैं। (हे वरानने, अब हमें तुम्हारे सदृश वनपंक्तियाँ ही रमण कराती हैं, वे वनपंक्तियाँ) पुष्पों के गुच्छे रूप स्तन धारण करती है, रक्त पल्लव ही उनके हाथ हैं, नानाविध मंजरियाँ ही उनके हार हैं, चंचल धवल मेच ही उनके चीनाम्बर हँ । अपना पराग ही उनका अंगराग हे, कुसुमं से वे अपना अलंकार निर्माण करती हैं । उपभोग करने योग्य सुवर्णशीलारूप नितम्बतटों से वे सुहावनी लगती हैं, वे तरंगरूप मोतियों से पिरोयी गयी सरितरूपी मुक्तालताओं से परिवृत्त रहती हैं, उनके चारों ओर लतारूपी सखियाँ राजित रहती हैं, उनके शिशु मुग्ध-मुग्ध मृग हैं, वे स्वभावतः ही उत्कट सौगन्ध से परिपूर्ण रहती हैं, क्षुधितो को भोजन के लिए निरन्तर फल प्रदान करती हैं, भ्रमरपंक्तियाँ ही उनके नेत्र है, कुसुमपूर्णं लताएँ ही उनके बाहु आदि अंग हैं| तुम्हारे अधर के सदृश पान के योग्य तरंगपूर्ण रनों के रूप में परिणत हुई वे निरन्तर शीतल और निर्मल गात्रो से अत्यन्त कमनीय लगती हैं, इसलिए हे सुमुखि, वनराजियाँ ही तुम्हारे सदृश मुझे रमण कराती हैं | हे तन्वि, विरक्त हुआ मन जैसा एकान्त में सुखानुभव करता है वैसा न तो शशिविम्बों में और न ब्रह्मा एवं इन्द्र के आश्रय स्थानों में सुखानुभव करता हे । हे कोमलांगि, यह जो मैंने वन जाने का उत्तम विचार किया है, उसमें तुम किसी प्रकार की बाधा मत पहुँचाओ, क्योकि कुलीन स्त्रियाँ स्वप्न में भी पति की इच्छा का विघटन नहीं करतीं