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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 76, Verses 1–5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 76, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 1-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथैकदा पुरे श्रेष्ठे कस्मिंश्चिन्मण्डलान्तरे । अनपत्ये नृपं मृत्युरहन्मत्स्य इवामिषम् ॥ १ ॥ तत्र प्रकृतयः खिन्ना नष्टदेशक्रमा नृपम् । अन्विष्यन्ति स्म संयुक्तं गुणलक्ष्म्या विशालया ॥ २ ॥ तं भगीरथमासाद्य स्थिरं भिक्षाचरं मुनिम् । परिज्ञाय समानीय सैन्ये चक्रुर्महीपतिम् ॥ ३ ॥ भगीरथः क्षणेनैव प्रावृषीवाम्बुना सरः । वलितः सेनया गुर्व्या झटित्याशिश्रिये गजम् ॥ ४ ॥ भगीरथो जगन्नाथो जयतीति जनारवैः । नीरन्ध्रतामुपाजग्मुर्गिरीन्द्राणां महागुहा ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : किरी एक अन्य मण्डल में विद्यमान किसी एक उत्तम नगर में पुत्ररहित राजा को मृत्यु ने उस प्रकार मार डाला, जिस प्रकार क्षुद्र मत्स्य को महामत्स्य मार डालता है । जिनके देश की पालन मर्यादा नष्ट हो चुकी थी, ऐसे उस देश के उदासीन अमात्य जन आदि प्रजावर्ग पालनयोग्य उदार गुण-लक्ष्मी से युक्त किसी एक सुन्दर राजा के अन्वेषण में थे । योग्य राजा के अन्वेषण में तत्पर वे अमात्यादि प्रकृतिवर्ग भिक्षाचरण में निरत स्थिर भगीरथ मुनि के पास आकर प्रजापालनयोग्य समस्त शुभ गुणों से यह समन्वित है” यह निश्चय कर वहाँ पर आये हुए सैन्य में अभिषेककर उसे महीपति वना दिया । वर्षाकाल में जिस प्रकार सरोवर क्षणभर में ही जल से परिवृत्त हो जाता है उसी प्रकार राजा भगीरथ भी बड़े सैन्य से परिवृत्त हो गये ओर तत्काल ही हाथी पर चढ़ गये । “जगत्‌-स्वामी महाराज भगीरथ की जय हो, जय हो", इस प्रकार जनों के जयघोषो से पर्वतराजो की बड़ी-बड़ी गुफाएँ व्याप्त हो गई

सर्ग सन्दर्भ

पचहत्तरवाँ सर्ग समाप्त छिहत्तरवाँ सर्ग भगीरथ को पुनः राज्यप्राप्ति और ब्रह्मा, रुद्र आदि की आराधना करने से गंगाजी का भूतल पर अवतरण ।