Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 75, Verses 19–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 75, verses 19–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 19-21
संस्कृत श्लोक
धनानि वाजिविभवाद्यैश्वर्यं चाष्टधोदितम् ।
सिद्धैरप्यर्पितं तुष्टैर्मेनाते जर्जरं तृणम् ॥ १९ ॥
स्वकर्मणैव देहोऽयं यावत्सत्त्वमनिच्छया ।
धारणीय इति स्वेन कर्मणैवाथ तस्थतुः ॥ २० ॥
अभिननन्दतुरागतमुत्तमौ निजसमाचरणक्रमजं मुनी ।
सुखमसौख्यमभीप्सितवर्जितौ समसमेऽतिसमौ शमिनौ स्वतः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
उन दोनों का मानुष भोगों के सदश दिव्य भोगो में भी वैराग्य बतलाते हैं ।
उन दोनों ने उत्तम धन घोड़े आदि वैभवों को तथा चरितां से सन्तुष्ट ब्रह्मा आदि सिद्धो द्वारा दिये
गये अणिमादि आठ तरह के ऐश्वर्यों को जर्जर तृण के सदृश तुच्छ समझ रक्खा था । प्रारब्ध कर्म के
अनुसार ही जब तक आयु है तब तक अनिच्छा से भी यह धारण करना चाहिए, ऐसा निश्चय कर वे
अपने कर्म में स्थित थे। भद्र, वे उत्तम दोनों मुनि अपने पूर्व के आचरणक्रम से उत्पन्न यथासमय प्राप्त
सुख और दुःख दोनों का अभिनन्दन करते थे। वे सर्वविध इच्छाओं से वर्जित थे और समसे भी समरूप
ब्रह्म में एकरसस्वरूप होकर ब्रह्मस्वभाव से ही परम शान्ति से युक्त हो गये थे