Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 71, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 71, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
राजोवाच ।
आस्ते कदाचिच्चेदं हि ब्रह्माण्डमजरं फलम् ।
उत्तरोत्तरं दशगुणभूतत्वक्परिवेष्टितम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
"कस्य सूर्यरश्मीनाम्* इत्यादि प्रथम प्रश्न का उत्तर देने के लिए पहले वेताल का पाण्डित्याभिमान
निरासकर रहे राजा कुछ कल्पना चमत्कार वतलाते है ।
राजा ने कहा : हे वेताल, किसी समय यह (तुम्हारा और मेरा आधार) जीर्णताशून्य ब्रह्माण्डरूपी
फल उत्तरोत्तर दशगुण पृथिवी, जल आदि आवरणों से वेष्टित था