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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 66, Verses 1–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 66, verses 1–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 1-16

संस्कृत श्लोक

वाल्मीकिरुवाच । वसिष्ठमुनिसंयुक्ता विश्वामित्रादिसंयुताः । स्थिताः खेचरसिद्धौघा विश्रान्ता नृपनायकाः ॥ १ ॥ सरामलक्ष्मणा सैव तथैवाथ सभा बभौ । सौम्या समसमाभोगा शान्तवातेव पद्मिनी ॥ २ ॥ अनवेक्ष्य वचः प्रश्नमुवाचाथ मुनीश्वरः । बोधयन्ति बलादेव सानुकम्पा हि साधवः ॥ ३ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । राजन् रघुकुलाकाशशशाङ्क रघुनन्दन । ह्यो मया ज्ञाननेत्रेण स भिक्षुः प्रेक्षितश्चिरम् ॥ ४ ॥ ध्यानेनाहं चिरं भ्रान्तस्तादृग्भिक्षुदिदृक्षया । द्वीपानि सप्त विपुलां कुलशैलसपर्वताम् ॥ ५ ॥ यावत्कुतश्चिदप्येवं भिक्षुर्लब्धो न तादृशः । कथं किल मनोराज्यं बहिरप्युपलभ्यते ॥ ६ ॥ ततस्त्रिभागशेषायां रात्र्यां पुनरहं धिया । उत्तराशान्तरं यातो वेलावात इवार्णवम् ॥ ७ ॥ जिननामैष तत्रास्ति श्रीमान् जनपदो महान् । वल्मीकोपरि तत्रास्ति विहारो जनसंश्रयः ॥ ८ ॥ तस्मिन्विहारे स्वकुटीकोशे कपिलमूर्धजः । भिक्षुर्दीर्घदृशो नाम स्थित एव समाधये ॥ ९ ॥ एकविंशतिरात्रं च तस्यैवं स्थितिशालिनः । दृढार्गलं गृहं ध्यानभङ्गभीता विशन्ति नो ॥ १० ॥ भृत्याः प्रियाः किल तथा संतिष्ठति स भिक्षुकः । अद्यैव तस्य संवेत्तुं नियतेरीदृशी स्थितिः ॥ ११ ॥ रात्रयो ध्याननिष्ठस्य गतास्तस्यैकविंशतिः । स तु वर्षसहस्त्रानी तथा चित्तेन भूतवान् ॥ १२ ॥ कस्मिंश्चित्प्राक्तने कल्पे भिक्षुरेव पुराऽभवत् । अद्य त्विह द्वितीयोऽस्मिंस्तृतीयो नोपलभ्यते ॥ १३ ॥ मया तु पुनरन्विष्य चेतसा चतुरात्मना । तादृग् भिक्षुस्तृतीयोऽन्यो जगत्पद्मोदरालिना ॥ १४ ॥ अस्मात्सर्गात्ततो लब्धस्तृतीयस्तादृशाशयः । अथान्ये लीलया सर्गा मया संप्रेक्षितास्ततः ॥ १५ ॥ यावत्तस्मिंश्चिदाकाशकोशशायिनि सर्गके । तृतीयो विद्यते भिक्षुर्ब्राह्मश्च सदृशक्रमः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

महर्षि वाल्मीकिजी ने कहा : मुनि वसिष्ठजी से समन्वित ओर विश्वामित्र आदि ऋषियों से युक्त आकाशचारी सिद्धगण पहले बैठ गये, तदनन्तर राजा लोग और उनके बाद सामन्त आदि नायक बैठ गये। अनन्तर श्रीरामजी और लक्ष्मण के साथ वह सभा पहले-जैसी ही सौम्य होकर शोभने लगी। वह ऐसी अच्छी लगती थी मानों वायु के सम्बन्ध से रहित चिक्कन बराबर आकृतिवाली तलैया हो । उसके पश्चात्‌ मुनिराज श्रीवसिष्ठजी ने श्रीरामचन्द्रजी के नूतन प्रश्न की प्रतीक्षा करके (पहले दिन किये गये प्रश्न का उत्तर देने की प्रतिज्ञा के अनुसार) कहना आरम्भ कर दिया, क्योकि स्वभावतः दयाशील महात्मा लोग अधिकारी जनों को हठात्‌ बोध दिया ही करते हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे प्रकाशमान रघुकुलरूप आकाश के पूर्णचन्द्र श्रीरामजी, कल मैंने अपने ज्ञानचक्षु से उस भिक्षु का- चिरकाल तक अन्वेषण कर-अन्त में अवलोकन कर ही डाला । भद्र, ध्यान से उस तरह के भिक्षु का अवलोकन करने की अभिलाषा से साता द्वीप, कुलशैल एवं पर्वतो से मण्डित विपुल भूमण्डलपर दीर्घकाल तक मैंने भ्रमण किया ओर किसी भी तरह से मनःकल्पित वस्तु बाहर भी उपलब्ध हो सकती है या नहीं ? इस तरह का विचार करता हुआ मैं तब तक लगातार पर्यटन करता रहा, जब तक कि किसी ओर से वैसा भिक्षु मुझे प्राप्त न हुआ। आखिर में तृतीयांश रात्रि का शेष रह जानेपर समुद्र की ओर तटवर्ती वायु के सदृश मैं उत्तर प्रदेश की ओर जा पहुँचा और मन से मैंने विचार किया । भद्र, उस दिशा में वल्मीकनामक एक प्रदेश में ऊपर आगे जाकर एक दूसरा बडा प्रसिद्ध जिननामक रम्य जनपद है । उस बड़े देश में “विहार” नामक एक स्थान है, जहाँ पर अनेक जन निवास करते हैँ । उस विहार स्थान में समाधि की सिद्धि के लिए अपनी कुटी के भीतर "दीर्घदृश' नामका एक भिक्षु स्थित है, जिसके केश बिलकुल पीले पड गये हे । इस प्रकार समाधि मेँ स्थितिवाले उस भिक्षु की आज इक्कीसवीं रात हे । उसकी कुटिया दृढ़ सिक्‍कड़ों से बन्द है । उसके प्रिय नौकर भी ध्यानर्भग के भय से भीत होकर उसके भीतर प्रवेश करने की चेष्टा नहीं करते | केवल वह भिक्षु उसी प्रकार की समाधि में लगा हुआ है । आज ही उसके विदेहकैवल्य की प्राप्ति का अन्तिम समय है, क्योकि आयुष्यनियन्ता विधाता की ऐसी ही उसके लिए स्थिति हे । यद्यपि ध्याननिमग्न उस भिक्षु की अव तक इक्कीस रातें ही बीती हैं तथापि पूर्ववर्णित रीति के अनुसार चित्त के द्वारा इन इक्कीस रातों को ही उसने हजारों वर्ष के रूप में समञ्च लिया है । भद्र, इस प्रकार का भिक्षु पहले किसी एक पूर्वकाल में हो चुका था ओर आज इस कल्प में उस प्रकार का यह द्वितीय है । इन दोनों को छोडकर कोई तीसरा मुञ्चे दिखाई न पडा । जव तीसरा मुझे दिखाई न पड़ा तब मैंने चतुरतापूर्ण चित्त से इस जगद्रूप कमल के अन्दर भ्रमर के समान खूब परिभ्रमण किया ओर उस परिभ्रमण में मेने एक अन्य तीसरा ही भिक्षु पाया | हाँ, पाया तो सही, किन्तु इस सर्ग में नहीं; इसलिए इस सर्ग से भिन्न दूसरे अनेक सर्गो का लीलावश जव मैंने अवलोकन किया तब उन्हीं सर्गो में मुझे दूसरा भिक्षु मिला, जो किं ठीक पहले के समान स्वभाववाला ही हे । चैतन्याकाश के एक कोने में लीन, जिस परिमाण के उस सर्ग में तृतीय भिक्षु विद्यमान है वहाँ पर वहाँ के ब्रह्मा द्वारा निर्मित भुवन पद्धति इसी भुवन पद्धति के सदुश है

सर्ग सन्दर्भ

पैसठवाँ सर्ग समाप्त छासठवाँ सर्ग प्रयत्नपूर्वक खोजे गये भिक्षु का तथा भिक्षुसदृश भूत-भावी अन्य मुनियों का दर्शन, यह वर्णन ।