Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 65, Verses 13–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 65, verses 13–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 13-20
संस्कृत श्लोक
क्वचिदस्ति न वास्त्यन्तरालोक्य कथयाशु मे ।
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अद्य रात्रौ समाधिस्थस्त्रिलोकीमठिकामिमाम् ॥ १३ ॥
भिक्षुरेकोऽस्तिनास्तीति प्रेक्ष्य प्रातर्वदाम्यहम् ।
वाल्मीकिरुवाच ।
मुनौ चैवं कथयति बहिर्मध्याह्नडिण्डिमः ॥ १४ ॥
उदभूत्प्रलयक्षुब्धघनगर्जितमांसलः ।
तत्यजुः पादयोस्तस्य पुष्पाञ्जलिपरम्पराः ॥ १५ ॥
मृषाः पौरा विटपिनः पुष्पं वातधुता इव ।
पूजयित्वा मुनिश्रेष्ठानुदतिष्ठन्स्वविष्टरात् ॥ १६ ॥
सभा तदनु सोत्तस्थौ सप्रणामपरम्परा ।
क्रमेण ह्यस्तनेनैव जग्मुः खेचरभूचराः ॥ १७ ॥
स्वास्पदेषु यथाशास्त्रमहर्व्यापारमादृताः ।
सर्वे संपादयामासुर्निजधर्मं क्रमोचितम् ॥ १८ ॥
चिन्तयन्तो मुनिप्रोक्तं महीचरनभश्चराः ।
ज्ञानं क्षपां क्षणमिव निन्युः कल्पमिवापि च ॥ १९ ॥
प्रातः पुनः प्रसृतकार्यपरम्परेऽस्मिञ्जाते जने खचरभूचरभूतसङ्घः ।
आख्यानलोकरचनेन तथैव तस्थावन्योन्यसंवदनपूजितपूज्यलोकः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
भीतर योग से विचार कर आपको बोध देने के लिए यद्यपि कल्पना करके ही मैने भिश्च का वर्णन किया
है तथापि मेरे वाक्यो में असत्यता न होने से कहीं उसकी संभावना है ही । इस समय योग से उसका
अवलोकन करने में देर हो जायेगी, इस आशय से महाराज वस्िष्ठजी तत्कालोचित वचन कहते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, आज रात में समाधिनिष्ठ मैं इस त्रिलोकीरूपी मठिया का
निरीक्षणकर प्रातः काल में उस तरह का एक भिक्षुक है कि नहीं, यह कहूँगा । वाल्मीकिजी ने कहा :
मुनिवर वसिष्ठजी के यों कहते ही बाहर मध्याह काल की सूचक डिण्डिम वाद्य की ध्वनि हुई । वह
ध्वनि प्रलयकाल के विक्षुब् मेघों के गर्जन-सी पुष्ट थी । उस समय महाराज वसिष्ठजी के चरणों
में राजाओं और नागरिकों ने पुष्पांजलियों की परम्परा उस प्रकार बिखेर दी, जिस प्रकार वायु से
कम्पित वृक्ष पुष्प बिखेर देते हैं । अनन्तर अन्यान्य श्रेष्ठ-श्रेष्ठ मुनियों की पूजा कर वे सब अपने-
अपने आसन पर से उठ कर खड़े हो गये । उसके बाद वह सारी सभा परस्पर प्रणामों के साथ उठ
कर खड़ी हो गयी । और पहले दिन के क्रम के अनुसार भूचर-खेचर सब अपने-अपने स्थान को
चल दिये । सबने अपने-अपने आश्रममें शास्त्रानुसार तत्पर होकर अपना-अपना आहिक धर्म
यथाक्रम पूरा किया । मुनिद्रारा कहे गये शास्त्र का विचार कर रहे भूचर-खेचर सबने कल्पतुल्य भी
रात क्षणभर की नाई बिता दी । भूचर-खेचर आदि प्राणिसमूह रात बिताकर प्रातःकाल, जबकि सब
लोग अपने-अपने कार्यों में जुट गये थे, दशरथजी की सभा में आकर पहले दिन की नाईं फिर
व्याख्यान सुनने के लिए योग्य सभापद्धति का निर्माणकर परस्पर संभाषण एवं पूज्य लोगों की पूजा
करते हुए बैठ गये