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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 62

इकसठवाँ सर्ग समाप्त बासठवाँ सर्ग जीवटाख्यान में विचित्र वासनाओं के कारण भिक्षुके मनोव्यापार से घटित अनेक देहो की प्राप्तिरूप भ्रम का वर्णन |

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  1. Verses 1–6महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, "एक भ्रम से दूसरे भ्रम में जा रहे” इस कहे गये अर्थ में…
  2. Verses 7–17स्थित वृक्ष की नाई, चित्त में संस्काररूप से स्थित सभी व्यवहारो से युक्त होकर सो गया । इसक…
  3. Verses 18–37जन्म में समूल अनर्थो की निवृत्ति एवं निरतिशय आनन्दप्राप्ति के सम्पादित कर लेने और उससे अत…