Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 62, Verses 1–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 62, verses 1–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 1-6
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अत्र राघव वक्ष्येऽहमितिहासमिमं श्रृणु ।
यद्वृत्तं कस्यचिद्भिक्षोः किंचिन्मननशालिनः ॥ १ ॥
आसीत्कश्चिन्महाभिक्षुः समाध्यभ्यासतत्परः ।
नित्यं स्वव्यवहारेण क्षपयत्यखिलं दिनम् ॥ २ ॥
समाध्यभ्यासशुद्धं तत्तस्य चित्तं क्षणेन यत् ।
चिन्तयत्याशु तद्भावं गच्छत्यम्ब्विव वीचिताम् ॥ ३ ॥
कदाचित्स समाधानविरतोऽतिष्ठदेकधीः ।
किंचित्संचिन्तयामास स्वासनस्थः क्रियाक्रमम् ॥ ४ ॥
तस्य चिन्तयतो जाता प्रतिभेयमिति स्वतः ।
भावयाम्याशु लीलार्थं सामान्यजनवृत्तिताम् ॥ ५ ॥
इति संचिन्त्य चेतोऽस्य स्थितं किंचिन्नरान्तरम् ।
स्पन्दसंस्थानसंत्यागमात्रेणावर्तनेऽम्ब्विव ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, "एक भ्रम से दूसरे भ्रम में जा रहे” इस कहे गये अर्थ में
दुष्टान्तभूत यह एक ऐसा इतिहास, जो किसी एक साधारण मननशील भिक्षुक का वृत्तान्त है, कहता
हूँ, आप उसे सुनिए। भद्र, समाधि के अभ्यास में निरत ओर शम, दम, वैराग्य आदि से सम्पन्न कोई एक
परिव्राजक था। वह निरन्तर अपने आश्रमोचित श्रवण, मनन आदि व्यवहारो से पूरा दिन बिताता था।
समाधि के (ध्येयाकार की दढता से चित्त को पूर्वरूप की शून्यता में परिणत कर देना स्वरूप समाधि
के) अभ्यास से पहले की वासनाओं का त्याग कर देने में समर्थ हुए उस परिव्राजक का वह चित्त, क्षण
में जिसका चिन्तन करता था शीघ्र ही वह उस भाव को वैसे प्राप्त हो जाता था; जैसे जल तरंगभाव
को । किसी एक समय में समाधि से विरत होकर वह उठा ओर एकाग्रचित्त होकर अपने ही आसन पर
वैठा। उस पर स्थित होकर वह किरी एक क्रियाक्रम का विचार करने लगा । उस प्रकार विचार कर रहे
उस परिव्राजक को स्वतः ही यह संकल्प हुआ कि मैं तत्काल ही लीलावश शास्त्रसंस्कारों से हीन
पामरजनों के चित्त की चेष्टाओं की भावना करूँ । श्रीरामजी, इस प्रकार विचार करने के बाद उस
परिव्राजक का चित्त किसी एक यतिधर्मं से अनियन्त्रित अन्य पामर पुरुष के रूप में उस प्रकार परिणत
होकर स्थित हुआ, जिस प्रकार विलोडन करने पर जल अपने पूर्व प्रवाह तथा समस्थिति को छोडकर
नाभि के आकार के सदृश “भँवर" नामक दूसरे रूप में परिणत होकर स्थित रहता हे
सर्ग सन्दर्भ
इकसठवाँ सर्ग समाप्त बासठवाँ सर्ग जीवटाख्यान में विचित्र वासनाओं के कारण भिक्षुके मनोव्यापार से घटित अनेक देहो की प्राप्तिरूप भ्रम का वर्णन |