Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 36, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 36, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
बालाग्रकादप्यणुना व्याप्तानेनाखिला मही ।
सप्ताब्धिवसनाप्युर्वी नास्यान्तमधिगच्छति ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ को ही विशवरूप से कहते हैं।
हे मुने, यद्यपि यह चितितत्त्व केश के अग्रभाग से भी सूक्ष्मतम है; तथापि इसने समस्त पृथिवी
व्याप्त कर रक्खी है। सात समुद्ररूप वस्त्रवाली पृथिवी भी इसकी अन्तिम सीमा प्राप्त नहीं कर
सकती