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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 16, Verses 6–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 16, verses 6–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 16 · श्लोक 6-9

संस्कृत श्लोक

इदमासनमिप्युक्त्वा नवं कल्पतरुच्छदम् । उपानीतवति त्यक्तभृत्ये वायसनायके ॥ ६ ॥ भुशुण्ड उत्थिते स्वीयकलापक्षेषु पक्षिषु । उपविष्टं मुनिं दृष्ट्वा स्वासनोन्मुखदृष्टिषु ॥ ७ ॥ समन्तात्खगवृन्देन भुशुण्डेन समं ततः । तस्मिन्कल्पलतापुञ्जे ह्युपविष्टोऽहमासने ॥ ८ ॥ अर्घ्यपाद्यादि संपाद्य भुशुण्डस्तुष्टमानसः । मामुवाच महातेजाः सौहृदान्मधुराक्षरम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर आपके बिराजने के लिए यह आसन है, यों कहकर वह कौओं का अधिपति भुशुण्ड आसन लाने के लिए चाकरवर्ग का परित्याग कर स्वयं खडा हुआ ओर कल्पवृक्ष का नवीन पत्ररूप आसन लाया । तदनन्तर मेँ भुशुण्ड के साथ उस कल्पवृक्ष की लताओं से बने हुए आसनपर बैठ गया । भुशुण्ड के चारों ओर पक्षियों का समूह था मननशील मुझे उस आसन पर आसीन देखकर अपने कान्तिमण्डल से प्रसरणशील पंखोवाले उक्त सभा के कोए अपने-अपने आसनो की ओर दृष्टि डालने लगे । भुशुण्ड ने अर्ध्य, पाद्य आदि सम्पादन कर मेरा सत्कार किया । महान तेजस्वी वह भुशुण्ड अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर सुन्दर, सौहार्द से मधुर वचन मुझसे कहने लगा