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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 122, Verses 2–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 122, verses 2–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 2-6

संस्कृत श्लोक

वर्णधर्माश्रमाचारशास्त्रयन्त्रणयोज्झितः । निर्गच्छति जगज्जालात्पञ्जरादिव केसरी ॥ २ ॥ वाचामतीतविषयो विषयाशादशोज्झितः । कामप्युपगतः शोभां शरदीव नभस्तलम् ॥ ३ ॥ गम्भीरश्च प्रसन्नश्च गिराविव महाह्रदः । परानन्दरसाक्षुब्धो रमते स्वात्मनात्मनि ॥ ४ ॥ सर्वकर्मफलत्यागी नित्यतृप्तो निराश्रयः । न पुण्येन न पापेन लिप्यते नेतरेण च ॥ ५ ॥ स्फटिकः प्रतिबिम्बेन यथा याति न रञ्जनम् । तज्ज्ञः कर्मफलेनान्तस्तथा नायाति रञ्जनम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके अर्थ सिद्ध विद्रत्सन्यास का वर्णन करते हैं। (7)) सम्राट की नाई यानी मनुष्यों के आनन्द की परमावधि में पहुँचे हुए राजा नी नाई । यह उपमा अज्ञानियोँ की दृष्टि से दी गयी है, तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि से तो उस तरह के जीवन्मुक्त यति के आनन्द की उपमा ही नहीं है; क्योंकि "यतो वाचो निर्वतन्ते“ इत्यादि श्रुति से हिरण्यगर्भ के आनन्द तक विषयानन्दरूपी जलबिन्दुओं का महासागर बतलाकर उस परमानन्द की कोई सीमा है ही नहीं, यह प्रतिपादन किया गया हे । वर्णो एवं आश्रमो, धर्मो तथा आचारो से रहित और शास्त्रों के नियमन से वर्जित वह संन्यासी जगज्जाल से यानी ऐहिक ओर पारलोकिक क्रियाओं के कर्तृत्व की तथा उनके फल भोक्तृत्व की वासनाओं से, पिंजडे से सिंह की नाई निकल जाता हे । एकमात्र निरतिशयानन्द के अनुभव का विषय यानी निरतिशयानन्दरूप अतएव विषय की आशादशाओं से निर्मुक्त यानी अत्यंत विरक्त हुआ पुरुष, शरत्‌-काल में आकाश की नाई, किसी निरूपाधिक शोभा को प्राप्त हो जाता है । पर्वत के ऊपर स्थित महासरोवर की तरह गम्भीर ओर प्रसन्न तथा निरन्तर ब्रह्मानन्द के आस्वादन से च्युत न हुआ योगी अपनी आत्मा मेँ ही अपने स्वरूप से रमण करता रहता हे सम्पूर्ण कर्मो के फलों का त्याग करनेवाला नित्यतृप्त ओर निराश्रय वह योगी पुरुष न तो पुण्य से, न पाप से ओर न हर्ष-विषाद आदि से ही लिप्त होता हे । जैसे स्फटिक मणि किसी प्रतिबिम्बभूत नील, पीत आदि द्रव्यविशेष से रंजन को प्राप्त नहीं होता यानी प्रतिबिम्बभूत किसी द्रव्य के रंग को धारण नहीं करता वैसे ही ब्रह्मज्ञानी भी कर्मफल से अपने अन्तःकरण में किसी के रंग को धारण नहीं करता