Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 122, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 122, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
मनुरुवाच ।
येन केनचिदाच्छन्नो येन केनचिदाशितः ।
यत्रक्वचनशायी च स सम्राडिव राजते ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
शनिरस्तनिःशेषविकल्पविष्लवा" (उसके सारे विकल्पविभ्रम विलीन हो जाते हैँ ।) इत्यादि से जो
योगी की स्थिति कही गयी है, उसीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते है ।
मनु ने कहा : जिस किसी पुरुष के द्वारा वस्त्रो से ठक दिया गया, जिस किसी पुरुष के द्वारा खिला
दिया गया तथा जहौ - कहीं सो जानेवाला योगी, सम्राट् की नाई, (70) सुशोभित होता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ इक्कीसर्वों सर्ग समाप्त एक सौ बाईसवाँ सर्ग सुदृढ आत्मबोध से सम्पन्न तथा तुरीयातीत पद में स्थित जीवन्मुक्त यति की दिनचर्या का लक्षणों से मनु द्वारा वर्णन |