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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 119, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 119, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

मनुरुवाच । सर्गात्मभिर्विभुः स्पन्दैः क्रीडते बालवत्स्वयम् । संहारात्मकशक्त्याथ संहृत्यात्मनि तिष्ठति ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ अठारहवाँ सर्ग मसाप्त एक सौ उन्नीसवाँ सर्म विद्या और अविद्यारूपी आत्मशक्तियों के द्वारा सत्य और असत्य का निश्चय हो जाने से बन्ध ओर मोक्ष में पुरुष की स्वतन्त्रता रहती है, यह वर्णन । ^स्यन्देऽप्यसस्पन्दमिवेह तिष्ठ“ (इस व्यवहारभूमि में देहेन्द्रियादि स्पन्द होने पर भी स्पन्दशून्य ब्रह्म के सदश स्वस्थ ओर सुखी बनकर रहो) इत्यादि जो कहा गया है सो यहाँ पर ब्रह्म माया द्वारा किसलिए स्पन्दित होता है ओर किसलिए स्पन्द से शून्य स्थित रहता है, इस तरह की इक्ष्वाकु की जिज्ञासु को वेष्टाओं से समझकर मनु महाराज कहते है । मनु ने कहा : सर्वव्यापक यह परमात्मा प्रसवधर्मिणी अविद्याशक्ति से अविद्वानों के सामने स्वयंसूष्टिरूप क्रियाओं से बच्चों की नाई क्रीड़ा किया करता है और विद्वानों के सामने सृष्टिसंहाररूप विद्याशक्ति से समूल सृष्टि का संहार करके कूटस्थ अद्वय आत्मा में सदेव स्थित रहता है