Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 119
10 verse-groups
- Verse 1एक सौ अठारहवाँ सर्ग मसाप्त एक सौ उन्नीसवाँ सर्म विद्या और अविद्यारूपी आत्मशक्तियों के द्व…
- Verse 2राग से प्रवृत्त हुए चेतन में जैसे सृष्टिशक्ति का उदय अपने आप होता है वैसे ही वैराग्य से न…
- Verses 3–4जिस ज्ञातात्मा की जीव, जगत् दोनों मे साधारण एक सत्तारूप से संभावना की जा रही है, उसमें ह…
- Verse 5सर्वव्यापक स्वयंप्रकाश आत्मा का दर्शन न होना तथा असद्रूप एवं प्रकाशशून्य जगत् का दर्शन ह…
- Verse 6तब किस भावना से आत्मा को देखकर यह जीव सुखी होगा ? ऐसा प्रश्न होने पर उस भावना को कहते हैं…
- Verse 7को पार कर जाने की इच्छा रखनेवाले प्रत्येक प्राणी को चाहिए कि वह) अहमर्थ से यानी अहंकार से…
- Verse 8भद्र, यह अच्छा है ओर यह अच्छा नहीं है, इस प्रकार की भावना ही आपके दुःख की कारण है। जब वह…
- Verse 9हे राजन्, समाधि के अभ्यास से सभी पदार्थो की विस्मृति हो जाती है, इस विस्मृतिरूपी शस्त्र…
- Verse 10हे राजन्, तुम पहले समाधि से बाह्य अर्थो की भावना का ओर उसके हेतु धर्मअधर्म के जंगल का छे…
- Verse 11हे पुत्र, सबसे पहले तुम सदसद्रस्तु के विवेक के विलास से युक्त होकर समाधि से समस्त बाह्य क…