Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
वितथानर्थविच्छेत्ता सारः प्रश्नस्त्वया कृतः ।
यदिदं दृश्यते किंचित्तन्नास्ति नृप किंचन ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
उन प्रश्नों में सर्वप्रथम तत्त्वोपदेश में अत्यन्त उपयोगी होने के कारण “स्वरूपं चास्य की दृशम्
(इस जगत् का स्वरूप कैसा है) इस प्रश्न का उत्तर देतेहै।
हे महीपते, जो कुछ यह दिखाई दे रहा है, वह वस्तुतः कुछ भी नहीं है । यह गन्धर्वनगर तथा
मरुस्थल में जल जैसा अवस्थित हे । भाव यह कि मिथ्याभूत जगत् का जो असत्स्वरूप है वह सर्वथा
असत् ही हे