Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, Verses 5–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, verses 5–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 5-8
संस्कृत श्लोक
पूजितं स्वसभासंस्थं भगवन्तं प्रजापतिम् ।
इक्ष्वाकुरुवाच ।
मां योजयति धार्ष्ट्येन भगवन्करुणानिधे ॥ ५ ॥
भवत्प्रसाद एवायं भवन्तं प्रष्टुमञ्जसा ।
कुतः सर्गोऽयमायातः स्वरूपं चास्य कीदृशम् ॥ ६ ॥
कियदेतज्जगत्कस्य कदा केनेति कथ्यते ।
अहं कथं च विषमादस्मात्संसृतिविभ्रमात् ॥ ७ ॥
विमुच्येय घनास्तीर्णाज्जालादिव विहंगमः ।
मनुरुवाच ।
अहो नु चिरकालेन विवेके सुविकासिनि ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
इक्ष्वाकु ने कहा : हे भगवन्, आपकी दया ही आपसे धृष्टतापूर्वक पूछने के लिए मुझे प्रेरित कर रही
है । हे करुणानिधे, यह सृष्टि कहाँ से आई है, इसका स्वरूप कैसा है, यह संख्या ओर परिमाण से
कितनी बडी है, किस भोक्ता तथा स्वामी की यह भोग्य बनी हुई है । कब किसने इसकी रचना की है
इत्यादि सब आप वैदिक रीति से अच्छी तरह कहिये । अर्थात् वेद आदि के आधार पर चले आ रहे
उपदेशपरम्परारूप सम्प्रदाय के अनुसार जो आपको मालूम हुआ हो उसी का आप वर्णन कीजिये, तर्क
से नई कल्पना करके कुछ कहने की दया न कीजिये । हे भगवन्, सघन दूर तक बिछाये गये जाल से पक्षी
की नाई इस विषम संसारजाल से मैं किस तरह मुक्त हो सर्वगा ? मनु ने कहा : हे राजन्, अहो चिरकाल
के बाद सुन्दर विकासयुक्त विवेक होने पर तुमने यह ऐसा प्रश्न किया है, जो मिथ्याभूत अनर्थो का
उच्छेद कर देनेवाला तथा सब प्रश्नो का सार हे