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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 116

एक सौ पन्द्रहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सोलहवाँ सर्ग गल रहे तथा गलित हुए चित्त के लक्षणों का वर्णन ।

8 verse-groups

  1. Verses 1–2श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे सर्वधर्मज्ञ, हे भगवन्‌, अहंकार नामक चित्त जिस समय गलित हो जात…
  2. Verse 3सदा मुख की प्रसन्नता भी उसका लक्षण है, यह कहते हैं। हे श्रीरामजी, ज्ञानाग्नि से विवादहेतु…
  3. Verses 4–6कही हुई बातों का विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहे महाराज वसिष्ठजी दूसरे लक्षण भी कहते हैं। (चित…
  4. Verse 7ज्ञानियों के मुख पर भी युख-दुःख के चिह्न प्रसाद और मालिन्य आदि किसी समय दिखाई देते हैं जै…
  5. Verse 8चित्त गल जाने पर साधु पुरुष देवताओं का भी स्पृहणीय बन जाता है। इस पुरुष के हृदय में शीतल…
  6. Verses 9–10ऐसा साधु पुरुष यों ही स्वभावतः उपशान्त, कमनीय, सेव्य, अप्रतिरोधी (दूसरे की अभिलाषा का विघ…
  7. Verse 11अब आत्मलाभ की अत्यन्त सुलभता दर्शा रहे महाराज वस्निष्ठजी उसके लिए प्रवृत्त न हुए पुरुषों…
  8. Verse 12तब उसकी प्रवृत्ति में कौन-सा प्रथम उपाय है, यदि ऐसी कोई आशंका करे, तो उस पर-विवेक ओर वैरा…