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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, Verses 4–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, verses 4–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 4-6

संस्कृत श्लोक

वासनाग्रन्थयश्छिन्ना इव त्रुट्यन्त्यलं शनैः । कोपस्तानवमायाति मोहो मान्द्यं हि गच्छति ॥ ४ ॥ कामः क्लमं गच्छति च लोभः क्वापि पलायते । नोल्लसन्तीन्द्रियाण्युच्चैः खेदः स्फुरति नोच्चकैः ॥ ५ ॥ न दुःखान्यपब्रंहन्ति न वल्गन्ति सुखानि च । सर्वत्र समतोदेति हृदि शैत्यप्रदायिनी ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

कही हुई बातों का विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहे महाराज वसिष्ठजी दूसरे लक्षण भी कहते हैं। (चित्त के नष्ट हो जाने पर) वासनाओं की गाँठे छिन्‍्न-भिन्‍न-सी होकर धीरे-धीरे बिलकुल टूटने लग जाती है | क्रोध कम होने लग जाता है और मोह तो निःसन्देह मन्दता को प्राप्त हो जाता है। काम थक जाता है और लोभ तो न जाने कहाँ भाग जाता है, इन्द्र्यो खूब उल्लसित नहीं होतीं ओर न खेद ही अधिक स्फुरित होता है। उस समय दुःख बढ़ते नहीं और सुख अभिमानी बनाते नहीं है। हृदय में ठण्डक पहुँचानेवाली समता सब जगह उदित होती हे