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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, Verses 9–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

उपशान्तं च कान्तं च सेव्यमप्रतिरोधि च । निभृतं चोर्जितं स्वच्छं वहतीत्थं महद्वपुः ॥ ९ ॥ भावाभावविरुद्धोऽपि विचित्रोऽपि महानपि । नानन्दाय न खेदाय सतां संसृतिविभ्रमः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसा साधु पुरुष यों ही स्वभावतः उपशान्त, कमनीय, सेव्य, अप्रतिरोधी (दूसरे की अभिलाषा का विघात न करनेवाले) विनीत, बलशाली, स्वच्छ और महान्‌ शरीर को धारण करता है। विभव और दरिद्रता से विषम, विचित्र ओर महान्‌ होता हुआ भी यह संसारविभ्रम गलित-अहंकारवाले सज्जनों के प्रति न तो आनन्द के लिए है और न खेद के लिए है