Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 115, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 115, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
इत्युक्तं देवदेवेन भृङ्गीशाय पुरानघ ।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य तिष्ठ राम गतज्वरः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
विक्षेप के
हेतु सुख-दुःखों से; जय, पराजय आदि क्रिया-योगों से तथा लाभअलाभों से जिस पुरुष का चित्त
विक्षेप को प्राप्त नहीं होता - वह महाभोक्ता कहा जाता हे । जो पुरुष जरा, मरण, आपत्ति, राज्य ओर
दारिद्रय आदि सबको ब्रह्मदृष्टि से रम्य ही समझता है - वह महाभोक्ता कहा जाता हे जैसे समुद्र
भिन्न-भिन्न जलों को समानरूप से ग्रहण करता है वैसे ही जो मनुष्य बड़े-बड़े सुख-दुःखों को भोग के
लिए समानरूप से (तुल्यवृत्ति से) ग्रहण करता है - वह महाभोक्ता कहा जाता है। चन्द्रबिम्ब से जैसे
किरणें उदित न होती हुई भी उदित होती हैं वैसे ही जिस पुरुष से अहिंसा, समता, सन्तुष्टि आदि गुण
वस्तुतः उदित न होते हुए भी उदित होते हैं - वह महाभोक्ता कहा जाता है। कडुआ, खड़ा, नमकीन,
तीखा, अदिव्य, दिव्य, उत्तम (सुस्वाद) या अधम (अस्वादु निकृष्ट) भी अन्न जो पुरुष समान बुद्धि से
खा लेता है - वह महाभोक्ता कहा जाता हे । सरस ओर नीरस तथा सुरत ओर विरत को (रतिविघात
को) जो सौम्य पुरुष एक सा देखता है - वह महाभोक्ता कहा जाता हे । क्षारयुक्त तथा चीनी से बनाये
गये नानाविध भक्ष्य पदार्थो में एवं शुभ या अशुभ वस्तुओं मे जिस पुरुष की निश्चल समता रहती हे, वह
महाभोक्ता कहा जाता हे । यह पदार्थ भोजन करने योग्य हे ओर यह भोजन करने योग्य नहीं हे, इस
तरह की विकल्पभावना को छोड करके जो पुरुष अभिलाषाओं से शून्य होकर भोजन करता है - वह
महाभोक्ता कहा जाता है । आपत्ति, सम्पत्ति, मोह तथा आनन्ददायक उत्कृष्ट एवं अपकृष्ट अन्न या
वस्तु का जो - सर्वत्र एकरूप ब्रह्मदुष्टि से - उपभोग करता है - वह पुरुष महाभोक्ता कहा जाता है ।
धर्म, अधर्म, सुख, दुःख तथा जन्म एवं मरण का जिस पुरुष ने निरतिशयानन्द पूर्णद्वियात्म बुद्धि से
त्याग कर दिया है - वह महात्यागी कहा जाता हे । सम्पूर्ण इच्छाओं, समस्त शंकाओं, वाणी, मन ओर
शरीर की सभी चेष्टाओं तथा सर्वविध निश्चयो का जिस पुरुष ने अपनी बुद्धि से भलीभाँति त्याग कर
दिया है - वह महात्यागी कहा जाता है । देह, मन, इन्द्रियों तथा मन की स्थिति की सत्ता का तत्-तत्
दुःखों के साथ जिसने मिथ्यात्वबुद्धि से परित्याग कर दिया है - वह महात्यागी कहा जाता है । शरीर मेरा
नहीं है, मेरा जन्म भी नहीं हुआ है, इष्ट ओर अनिष्ट के आचरणरूप विहित ओर निषिद्ध कर्म भी मेरे
नहीं है - यों अपने हृदय में जिस पुरुष ने दृढ़ निश्चय कर लिया है -वह महात्यागी कहा जाता हे । जिस
पुरुष ने धर्म ओर अधर्मं (शारीरिक) तथा वाणी आदि द्वारा चेष्टित (मानसिक) सब विषयों का परित्याग
कर दिया है, वह महात्यागी कहा जाता ह । जितनी यह सम्पूर्णं दृश्य कलना दिखाई दे रही है उसका
जिस पुरुष ने अच्छी तरह से त्याग कर दिया है - वह महात्यागी कहा जाता है ॥२४-३ ८॥
अब उपसंहार करते है ।
हे अनघ, देवदेवेश भगवान् शंकर ने बहुत दिन पहले भृंगीश को इस तरह का (पूर्वोक्त रीति का)
उपदेश दिया था । हे रामजी, आप भी इसी दृष्टि का अवलम्बन कर सांसारिक तापों से शून्य होकर
अवस्थित रहिये