Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 110, Verses 9–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 110, verses 9–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 9-17

संस्कृत श्लोक

अथ प्रतीहारपदे तिष्ठन्तीमाह मानिनीम् । अद्य देवीपदे राज्ञीं त्वां करोम्यभिषेकिनीम् ॥ ९ ॥ इत्युक्त्वा सरसि स्नाप्य महादेवीपदे तथा । अभिषिक्तां नृपः कृत्वा स तामाह निजां प्रियाम् ॥ १० ॥ प्रिये कमलपत्राक्षि क्षणात्संकल्पसंभवम् । महाविभवमुद्दामं सैन्यमाहर्तुमर्हसि ॥ ११ ॥ इति कान्तवचः श्रुत्वा चूडाला वरवर्णिनी । सैन्यं संकल्पयामास प्रावृड्घनमिवोद्भटम् ॥ १२ ॥ सैन्यं ददृशतुस्तत्तौ वाजिवारणसंकुलम् । पताकापूरिताकाशं नीरन्ध्रीकृतकाननम् ॥ १३ ॥ तूर्यारवध्वनच्छैलगुहागहनकोटरम् । मौलिरत्नमहोद्द्योतविचूर्णिततमःपटम् ॥ १४ ॥ तत्र गन्धद्विपवरे कृतपार्थिवमण्डले । रक्षिते हृष्टसामन्तैरारूढौ नृपदंपती ॥ १५ ॥ ततः शिखिध्वजो राजा महिष्या सममिष्टया । पदातिरथसंबाधं कर्षन्नतिवृलो बलम् ॥ १६ ॥ चचालाचलचालिन्या सेनया स ततो वनात् । भिन्दन्निव रसाशैलं वात्ययेवाशु भौमया ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर पट्टाभिषेक न होने के कारण द्वारपाल के स्थान पर बड़े विनय के साथ स्थित उस मानिनी चूडाला से राजा ने कहा : हे मनोरमे, अब तुम्हें महारानी के पद पर अभिषिक्त कर पटरानी बनाता हूँ। इस तरह कहकर तालाब मेँ स्नान कराकर तथा महारानी के पद पर अभिषिक्त करके राजा ने अपनी उस प्रिया से कहा : हे कमलपत्र-सी आँखोंवाली प्रिये, तुम योगसिद्धि के द्वारा अपने सत्यसंकल्प से उत्पन्न, नानाविध अलंकार, शस्त्रास्त्र आदि महाविभव से युक्त बड़ी भारी सेना क्षणभर में एकत्र कर सकती हो । अपने स्वामी का ऐसा वचन सुनकर सुन्दर रंगवाली उस चूडाला ने, वर्षाकाल के मेघ के सदृश, रणवीरों के सैन्य का संकल्प किया । तदनन्तर उन दोनों ने वह सेना देखी, जो हाथी-घोड़ों से व्याप्त थी, जिसने पताकाओं से आकाश को भर दिया था ओर जिसने सारे जंगल को अवकाश से शून्य बना दिया था । जिसके तुरही आदि के शब्दों से पर्वत की गुफाएँ तथा गहनकोटर प्रतिध्वनि कर रहे थे ओर मस्तक के रत्नों के महाप्रकाश से अन्धकार के समूह को जिसने चूर्णचूर्ण बना दिया था | राजाओं के बनाये गये अनेक समूहों से युक्त उस सेना में, जिसके मदगन्ध को दूसरे हाथी नहीं सह सकते, ऐसे एक सुन्दर मदगन्धवाले हाथी के ऊपर वे राजदम्पती (वे राजा ओर रानी) सवार हुए । तदनन्तर अपनी प्रियतमा महारानी के साथ महाबलवान्‌ वह राजा शिखिध्वज पैदल और रथ से व्याप्त उस बड़ी भारी सेना को खींचता हुआ तथा पर्वतोँ को हिला देनेवाली उस सेना से, भूमि से उठी हुई महावायु-जैसी, रसाशेल को (पृथ्वीरूप पहाड़ को) भेदन करता हुआ उस वन से शीघ्र चल दिया