Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 105, Verses 25–40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 105, verses 25–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 25-40
संस्कृत श्लोक
तदन्येषामुपायः स्यात्क इवागमभूषणः ।
खेदे खेदोचितं वाच्यमिति किंचित्त्वमुक्तवान् ॥ २५ ॥
इदानीं समतामेत्य तिष्ठाखिन्नो यथास्थितम् ।
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
तावेवमादिभिर्वाक्यैरन्योन्याश्वासनं स्वयम् ॥ २६ ॥
कृत्वा स्थितौ वनस्निग्धौ सुहृदौ खेदिनौ मिथः ।
अथार्कोऽप्यस्य कुम्भस्य स्त्रीत्वमुत्पादयन्निव ॥ २७ ॥
जगामास्तं जगद्दीपो दीपः स्नेहक्षयादिव ।
व्यवहारभरैः सार्धं पद्माः संकोचमाययुः ॥ २८ ॥
मार्गाश्च पथिकैः सार्धं पान्थस्त्रीहृदयानि च ।
दाशवद्विहगान्सर्वान्कुर्वदेकत्र संचितान् ॥ २९ ॥
तारकारत्नजालाढ्यं भुवने साम्यतां ययौ ।
खं हसदिव ताराढ्यं विकासिकुमुदाकरम् ॥ ३० ॥
ययावुन्नादचक्राह्वभ्रमद्भ्रमरपेटकम् ।
सुहृदौ तावथोत्थाय संध्यामुद्यन्निशाकराम् ॥ ३१ ॥
वन्दयित्वा तथा कृत्वा जप्यं गुल्मान्तरे स्थितौ ।
ततः कुम्भः शनैस्तत्र स्त्रैणमभ्याहरन्वपुः ॥ ३२ ॥
शिखिध्वजं पुरःसंस्थं प्रोवाच गलदक्षरम् ।
पतामीव स्फुरामीव द्रवामीवाङ्गयष्टिभिः ॥ ३३ ॥
लज्जयैव च ते राजन्मन्ये स्त्रीत्वं व्रजाम्यहम् ।
पश्येमे परिवर्धन्ते राजन्मम शिरोरुहाः ॥ ३४ ॥
प्रस्फुरत्तारकामाला दिनान्ततिमिरा इव ।
पश्येमौ मम जायेते प्रोन्मुखावुरसि स्तनौ ॥ ३५ ॥
कोरकाविव पद्मिन्या वसन्ते गगनोन्मुखौ ।
आगुल्फमेव लम्बानि संपद्यन्तेऽम्बराणि मे ॥ ३६ ॥
देहादेव सखे पश्य स्त्रिया इव शनैः शनैः ।
भूषणान्युत रत्नानि माल्यानि विविधानि च ॥ ३७ ॥
पश्येमान्यङ्ग जायन्ते स्वाङ्गेभ्यो वृक्षपुष्पवत् ।
पश्यायं स्वयमेवाद्य चन्द्रांशुकरशोभनः ॥ ३८ ॥
मूर्ध्नि पट्टांशुको जातो नीहारोऽद्राविवाङ्ग मे ।
सर्वाणि कान्तालिङ्गानि जातानि मम मानद ॥ ३९ ॥
हा धिक्कष्टं विषादो मे किं करोम्यङ्गनास्म्यहम् ।
हा धिक्कष्टमहो साधो स्थित एवाहमङ्गना ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
मैं तो समझता हूँ कि यह आपका खेद नहीं है, किन्तु केवल खेदोचित वाणी का ही लोकाचार का
वर्णन करने के लिए उपयोग कर रहे है, यह कहते है ।
खेद के विषय में खेदोपयोगी कुछ कहना चाहिए, इस अभिप्राय से आपने कुछ कहा, यह मेरा
मन्तव्य है अव आप समता धारण कर प्रकृतिस्थ हो अखिन्नरूप से स्थित हो जाइए । महाराज वसिष्ठजी
ने कहा : हे श्रीरामभद्र, उस तरह के अनेक वाक्यों के द्वारा वे दोनों परस्पर अपने-आप आश्वासन कर
स्थित हो गये । उन दोनों को अरण्य से बड़ा प्रेम था, वे एक दूसरे के अभिन्न मित्र थे ओर परस्पर एक
दूसरे के दुःख से दुःखी रहनेवाले थे । परस्पर आश्वासन ग्रहण करने के बाद कुम्भ में स्त्रीरूपता का
मानों उत्पादन कर रहे जगत् के दीपकरूप भगवान् सूर्य भी, तेल के क्षय से दीपक की नाई, अस्ताचल
की ओर चल दिये । जगत् के समस्त व्यवहारो के साथ-साथ कमल संकुचित होने लगे, पथिको के
साथ-साथ मार्ग अन्धकार के कारण अस्फुट होने लगे, पथिक ओर पथिकस्त्रियों के अन्तःकरण
वियोगशोकरूप अन्धकार से आक्रान्त होने लगे। समुद्र के द्वीप में रहनेवाले धीवर लोग जालो से पक्षी,
मछलियों ओर समुद्रस्थ रत्नों को एकत्रित करते हैं, इसलिए समुद्रद्रीप मेँ रहनेवाले धीवरो के सदृश एक
जगह सब पक्षियों को बटोर रहा नीचे का भुवन ओर एक जगह तारकरूपी रत्नों को इकट्ठा कर रहा
ऊपर का भुवन - ये दोनों एक दूसरे की समता करने लग गये । विकसित कुमुदो के भंडार अतएव हँस
रहे पुरुष के सदुश स्थित तारों से परिपूर्णं आकाश की ओर चक्रवाक और घूम रहे भ्रमरो के झुण्ड-के-
झुण्ड उत्ताल निनादध्वनि करते हुए उड़ने लगे | वे दोनों मित्र उठकर उदयोन्मुख निशाकर से युक्त
सन्ध्या को अभिवादन कर तथा जपकर्म कर एक गुल्म के (लतागृह के) भीतर बैठ गये । तदनन्तर, वहाँ
धीरे-धीरे क्रमशः स्त्री के अंगों में परिवर्तित होनेवाले कुम्भ सामने बैठे हुए राजा शिखिध्वज से गद्गद्
होकर कहने लगे । हे राजन्, अब मुझे ऐसा मालूम पडता है कि मैं अपने शरीर की अंगलताओं के साथ
भूमि पर मानों गिर रहा हूँ, स्फुरित हो रहा हूँ और विगलित होने लग गया हूँ। अब मानता हूँ कि आपके
सामने लज्जा के साथ ही मैं स्त्रीरूप बनता जा रहा हूँ। हे राजन्, देखिये, ये मेरे केश - दिन की समाप्ति
में बढ़नेवाले घने अधरे के सदृश - स्फुरणशील तारों की माला से मालित होकर यानी मोती आदि की
मालाओं से समन्वित होकर - बढ़ रहे हैँ । महाराज, देखिये तो सही, वसन्तकाल में गगन की ओर मुख
किये कमलिनी के कोरकों के (कलियां के) सदृश मेरी छाती में उर्ध्वमुख स्तन निकल रहे हैं । हे मित्रवर,
यह देखिये, मेरी देह से ही स्त्रियों के - जैसे धीरे धीरे एड़ी तक मेरे लिए लम्बे- लम्बे वस्त्र निकल रहे हैं ।
हे प्रिय मित्र, देखिये, मेरे अंगों से ही, वृक्ष से उसके अंगों से (शाखाओं से) फूलों की नाई, भूषण, रत्न
और विविध मालाएँ निकल रहीं हैं । प्रिय, यह देखिये, हिमांशु की किरणों के सदुश मनोहर मेरे मस्तक
पर अपने आप ही, पर्वत पर कुहरे की नाई, पट्टवस्त्र निकल रहा हे । हे मानद, मुझे सभी तरह के स्त्रियों
के चिह्न उत्पन्न हो गये, मुझे धिक्कार है, महान् कष्ट है, मे महान् विषाद का अनुभव करता हूँ, क्या
करूँ, अब मैं रत्री बन गया । हे साधो, हा धिक्कार है, कष्ट है, अब मैं पूर्ण सत्रीरूप ही होकर स्थित हूँ,
प्रत्यक्षतः भीतर नितम्ब ओर मांसल इन जंघाओं का मैं अनुभव करता हूँ