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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verses 49–51

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, verses 49–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 49-51

संस्कृत श्लोक

त्वादृशो बन्धुराप्तश्च सुहृन्मित्रं तथा सखा । विश्वास्यो वापि शिष्यश्च मन्ये जगति नास्ति मे ॥ ४९ ॥ शिखिध्वज उवाच । अहो नु फलितं पुण्यपादपैर्नः कुलाचले । यस्माद्भवानसङ्गोऽपि वाञ्छत्यस्मत्समागमम् ॥ ५० ॥ इदं वनमिमे वृक्षा भृत्योऽयमहमादृतः । रोचते ते न चेतस्वर्गस्तदिह स्थीयतां प्रभो ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

मुझमें जो आपकी इतनी प्रीति बढ़ गई है, इसका अतिशय कारण क्या है ? हे राजन्‌, इस जगत्‌ में मेरा आपके सदृश बन्धु, आप्ता, सुहृत्‌, मित्र, सखा अथवा विश्वनीय कोई शिष्य भी नहीं हे, ऐसा मैं समझता हूँ। राजा शिखिध्वज ने कहा : अहो, आज इस मन्दराचल के ऊपर हमारे पुण्यवृक्ष फल गये, क्योकि असंग हुए भी आप हमारा समागम चाह रहे हैँ । हे प्रभो, मुझमें प्रीति होने के कारण यदि आपको सवर्ग अच्छा नहीं जान पडता, तो यहीं मेरे निकट रहिये आपके लिए यह जंगल हे, ये वृक्ष हैं और यह मैं हूँ उपस्थित आपका आदृत सेवक