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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verses 37–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, verses 37–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 37-48

संस्कृत श्लोक

न बोधयामि यद्येनं चिरात्तद्बुध्यते स्वयम् । किमेकैवावतिष्ठेऽहमित्येवं बोधयाम्यहम् ॥ ३७ ॥ इति संचिन्त्य चूडाला देहं करणपञ्जरम् । संत्यज्य प्राप चित्तत्त्वे स्थितिमाद्यन्तवर्जिते ॥ ३८ ॥ तत्र सा चेतनास्पन्दं कृत्वा सत्त्ववतः प्रभोः । स्वं विवेश पुनर्देहं स्वं नीडमिव पक्षिणी ॥ ३९ ॥ कुम्भाकृतिरथोत्थाय निविष्टा कुसुमस्थले । साम गातुं प्रवृत्ता सा भ्रमरीवृन्दनिःस्वना ॥ ४० ॥ तं सामस्वनमाकर्ण्य चित्सत्त्वगुणशालिनी । बुबुधे भूपतेर्देहे वसन्त इव पद्मिनी ॥ ४१ ॥ दृशं विकासयामास तां तदार्क इवाब्जिनीम् । गृहीतसत्त्वसंपत्तिः शिखिध्वजमहीपतिः ॥ ४२ ॥ अपश्यत्कुम्भमग्रस्थं सामगायनतत्परम् । परेण वपुषा युक्तं सामवेदमिवापरम् ॥ ४३ ॥ अहो बत वयं धन्याः पुनः प्राप्तो मुनिः स्वतः । इत्येवोदाहरव्राजा कुम्भाय कुसुमं ददौ ॥ ४४ ॥ दिष्ट्योदिताः स्मो भगवंस्तव चेतसि पावने । के नाम वा महासत्त्वाः प्रसादेष्वङ्ग नो स्थिताः ॥ ४५ ॥ अस्मत्पवित्रीकरणमेवागमनकारणम् । न चेत्किं चागमे ब्रूहि द्वितीयं कारणं भवेत् ॥ ४६ ॥ कुम्भ उवाच । यतः प्रभृति यातोऽस्मि त्वत्सकाशादनिन्दितः । ततः प्रभृति चेतो मे त्वयैवेह समं स्थितम् ॥ ४७ ॥ रम्ये स्वर्गे न तिष्ठामि समीपे तव सांप्रतम् । अभीष्टमुद्यदेवाङ्ग रम्याणां तत्पुरः स्थितम् ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

चिरकाल के बाद तो यह स्वयं समाधि से उठ जायेगा, इसे जगाने के लिए शीघ्रता करने की मुझे क्या आवश्यकता, इस पर कहते हैँ । यदि मैं इसे न जगाती हूँ तो भी यह चिरकाल के बाद स्वयं जाग जायेगा, लेकिन मैं यो अकेली हो क्यों अवस्थित रहूँ, इसलिए इसे जगाती हू । यों विचारकर इन्द्रियपंजररूपी अपनी देह को छोड करके स्वामी की देह में प्रविष्ट होकर आदि ओर अन्त से वर्जित अपने स्वामी के हार्द ब्रह्मस्वरूप चितितत्त्व में चूडाला स्थिति को प्राप्त हो गई । वहाँ पहुँचकर सत्त्वसम्पन्न अपने स्वामी की निर्विकल्प समाधि से जल ओर दूध की नाई एकरस बनी हुई चेतना का स्पन्दन कर वह चूडाला फिर अपनी देह मेँ उस तरह प्रविष्ट हो गई, जिस तरह अपने घोसले में चिड़िया | तदनन्तर कुम्भस्वरूपिणी वह चूडाला वहाँ से उठकर कुसुमपूर्णं स्थान में जाकर बैठ गई ओर वहीं बैठी हुई भ्रमरियों के गुंजार को तिरस्कृत कर रही वह चूडाला सामगान में प्रवृत्त हो गई । उस सामस्वर को सुनकर सत्त्वगुण से सम्पन्न चिदाभास से युक्त राजा की बुद्धि नखाग्र से लेकर मस्तक तक देह में अहंभाव की व्याप्ति से युक्त होकर ऐसे अवबुद्ध हुई, जैसे वसन्त में पद्मिनी जिस तरह सूर्य कमलिनी को विकसित करते हैं वैसे ही सत्त्वसम्पत्ति से युक्त राजा शिखिध्वज ने समाधि में निमीलित अपने नेत्र को विकसित किया । राजा शिखिध्वज ने साम के गान में तत्पर अपने आगे स्थित कुम्भऋषि को दिव्य शरीर से युक्त दूसरे सामवेद-जैसा देखा । अहो, हम धन्य हैं कि यह मुनि स्वयं यहाँ पुनः प्राप्त हैं, इतनी बात कह रहे राजा शिखिध्वज ने कुम्भ को पुष्पांजलि समर्पित की (~) । भगवन्‌, यह हमारे सोभाग्य की वात है कि आपके पावन चित्त में हम पुनः उदित हुए हे । अथवा हे मुने, हम अपने भाग्य की क्या सराहना करे, भला ऐसे महासत्त्वशाली कौन हैं, जो अपने आप ही दूसरों के ऊपर अनुग्रह करने के लिए सदा प्रस्तुत नहीं रहते ? हे भगवन्‌, हमें पवित्र करने के लिए ही आपका यहाँ आगमन हुआ है यदि यह बात न हो, तो फिर आप ही कृपाकर बतलाइये कि यहाँ आपके आने में दूसरा कौन-सा कारण है ? कुम्भ ने कहा : हे राजन्‌, अनिन्दित होकर मेँ आपके यहाँ से जवसे गया तभी से मेरा चित्त आपके साथ यहीं स्थित रहा । यही कारण हे कि मैं रम्य स्वर्ग मे भी नहीं ठहर सका ओर आपके समीप इस समय ठहरा हुआ हू । हे महीपते, बहुत-सी रम्य वस्तुओं के बीच में चित्त को जो सबसे अच्छी मालूम पड़ती है वह बड़े उद्योग से ही प्राप्त होकर सामने स्थित मिलती है, बिना उद्योग के कभी नहीं, इसलिए आपके दर्शन के उद्योगवश से ही यहाँ मेरा आगमन हुआ है