Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 88, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
त्रिकालदर्शिना नित्यं चिरं च किल जीवता ।
विचारितं च दृष्टं च मया तदखिलं स्वयम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अनन्तर तम ओर प्रकाश से शून्य अवस्था को प्राप्त कर मुनि वीतहव्य
ने कल्पना के हेतुभूत मनरूपी तृण को, जो किंचित् प्रकाशित भी था, आधे निमेष में मनसे ही काट
दिया