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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

कृत्वौर्ध्वदैहिकमथो व्यथयाभिभूतौ शोकोत्थया करुणयार्तगिरा विलप्य । चित्रार्पिताविव निरस्तसमस्तचेष्टौ तौ संस्थितौ सुखमशून्यहृदौ विवृत्तौ ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, तदनन्तर और्ध्वदेहिक (मरण के बाद की) क्रिया कर व्यथाग्रस्त उन दोनों ने शोक से निकली करुणापूर्ण दीन वाणी से (पिताओं के विषय में) अत्यन्त विलाप किया, उनकी समस्त सचेष्टाएँ निकल गई, वे मरे नहीं, पर विलाप के कारण एका-एक अशून्य हृदय हो गये यानी मूर्छित हो गये और उस समय चित्र में लिखित मनुष्यों की नाई उनकी स्थिति हुई