Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, Verses 17–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, verses 17–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 17-20
संस्कृत श्लोक
तत्रोत्तरतटे सानौ विनम्रफलपादपे ।
रत्नपुष्करिणीजालवहन्निर्झरवारिणि ॥ १७ ॥
चूतद्रुमलतोन्मुक्तपुष्पस्तबकदन्तुरे ।
विफुल्लाङ्कोलपुन्नागनीलनीरजदिक्तटे ॥ १८ ॥
लतावितानच्छन्नार्के रत्नांशुभम्भास्वरे ।
स्रवज्जम्बूरसस्यूते स्वलोकाह्लादकारिणि ॥ १९ ॥
ब्रह्मलोकसमः स्वर्गरम्यः शिवपुरोपमः ।
अत्रेरस्त्याश्रमः श्रीमान्सिद्धश्रमहरो महान् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उस पर्वत में उत्तर किनारे के शिखर पर जहाँ फलों से लदे विनम्र वृक्ष है, रत्नमयी अनेक बावड़ियों
से जल के झरने बह रहे हैं और जो आग्रवृक्ष की शाखाओं के द्वारा ऊपर की ओर विस्तारित फूलों के
गुच्छं से तन्तुर यानी ऊँचे दाँतों से युक्त होकर स्थित है, तथा जिसकी दिशाओं के तटों में विकसित
कोलक, पुन्नाग (श्वेत कमल) ओर नील कमल विद्यमान हैं, जिस पर सूर्य लताओं के विस्तार से ढक
जाता है, जो रत्नों के दीप्ति समूहों से अत्यन्त प्रकाशित हो रहा है, बह रहे जम्बूरसों से पूर्ण है और
स्वर्ग स्थान की नाईं अत्यन्त आनन्द देनेवाला है : महान्, सिद्धों का श्रम हरनेवाला, ब्रह्मलोक के
सदृश, स्वर्ग की नाई रमणीय, शिवजी के नगर की उपमावाला अत्यन्त सुन्दर महामुनि अत्रि का आश्रम
है