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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । मनसैव मनश्छित्त्वा यद्यात्मा नावलोक्यते । ममेत्यहमिति त्यक्त्वा तत्तामरसलोचन ॥ १ ॥ नास्तमेति जगद्दुःखं यथा चित्रगतो रविः । आयात्यापदनन्तत्वं महार्णववदातता ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मदर्शन के उपायों की उपेक्षा करने पर शोक, मोह आदि दुःखो की परम्परा हट नहीं सकती, इस विषय में भास और विलास की आख्यायिका का अवतरण करनेवाले महर्षि वसिष्ठजी कहते हैं : कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी, “पुत्र आदि मेरे हैं, यह देह आदि मैं हूँ" इत्यादि अभिमान का परित्याग कर शास्त्र आदि से संस्कृत मन से ही संकल्पात्मक चित्त का छेदन कर यदि आत्मा का साक्षात्कार नहीं किया जाय, तो चित्र में लिखित सूर्य के समान जगत्‌-रूपी दुःख का कभी भी अस्त नहीं होता । प्रत्युत महान्‌ समुद्र की नाई असीम संसाररूपी विपत्ति अनन्तता को प्राप्त करती ही रहती हे

सर्ग सन्दर्भ

चौसठवाँ सर्ग समाप्त पैंसठवाँ सर्ग सह्याद्वि पर्वत का, वहाँ स्थित अत्रि ऋषि के आश्रम का तथा महर्षि अत्रि के आश्रम मे स्थित विलास और भास नाम के दो तपस्वियों के जन्म, कर्म और शोक का वर्णन ।