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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 7, Verses 1–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 7, verses 1–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 1-4

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एष तावत्क्रमः प्रोक्तः सामान्यः सर्वदेहिनाम् । इममन्यं विशेषं त्वं श्रृणु राजीवलोचन ॥ १ ॥ अस्मिन्संसारसंरम्भे जातानां देहधारिणाम् । अपवर्गक्षमौ राम द्वाविमावुत्तमौ क्रमौ ॥ २ ॥ एकस्तावद्गुरुप्रोक्तादनुष्ठानाच्छनैः शनैः । जन्मना जन्मभिर्वापि सिद्धिदः समुदाहृतः ॥ ३ ॥ द्वितीयस्त्वात्मनैवाशु किंचिद्व्युत्पन्नचेतसा । भवति ज्ञानसंप्राप्तिराकाशफलपातवत् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

क्रम हें । उनमें से एक तो यानी पूर्वोक्त क्रम गुरु के उपदेश के अनुसार आचरण करने से धीरे-धीरे एक जन्म से अथवा अनेक जन्मों से मोक्षरूप सिद्धि देनेवाला कहा गया हे । दूसरा (आगे कहा जा रहा) क्रम है : दैववश प्राप्त जीव ओर जगत तत्त्व के विचारवाले लोगों को स्वयं ही शीघ्रता से आकाश से फल पतन के तुल्य ज्ञान प्राप्ति होती है