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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 3, Verses 17–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 3, verses 17–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 17-27

संस्कृत श्लोक

अथ तेषूपविष्टेषु स्वेषु स्वेष्वासनेषु च । सर्वेष्वेवोपविष्टेषु वसिष्ठोन्मुखदृष्टिषु ॥ १७ ॥ सभाकलकले शान्ते मौनसंस्थेषु बन्दिषु । वृत्तासु स्थितिवार्तासु सौम्ये तस्मिन्सभान्तरे ॥ १८ ॥ स्फुरत्पवनमालासु विशत्स्वम्भोजकोटरात् । परागेषु विलोलेषु मुक्तादामसु चञ्चलम् ॥ १९ ॥ बृहत्कुसुमदोलाभ्यः प्रसृताभ्यः समंततः । वाति मांसलमामोदमादाय मधुरानिले ॥ २० ॥ वातायनेषु मृदुषु कुसुमाकीर्णभूमिषु । पर्यङ्केषूपविष्टासु पश्यन्तीषु पुरंध्रिषु ॥ २१ ॥ जालागतार्ककरलोलविलोचनासु रत्नप्रभानिकरपिङ्गलकोमलासु । संत्यक्तचापललवं चपलासु तासु मौनस्थितासु सितचामरधारिणीषु ॥ २२ ॥ मुक्ताफलप्रतिफलप्रतिमार्करश्मिरागोदरास्वजिरभूमिषु पुष्पकौघम् । नासादयत्यभिनवातपबिम्बबुद्ध्या भ्रान्ते भ्रमत्यलिकुले नभसीव मेघे ॥ २३ ॥ पुण्यैर्वसिष्ठवदनप्रसृतं श्रुतं यत्तत्संततिप्रसृतविस्मयमार्यलोके । सत्संगमे मृदुपदाक्षरमुग्धवाक्यमन्योन्यमीप्सितमनल्पगुणाभिरामम् ॥ २४ ॥ दिग्भ्यः पुराच्च गगनाच्च वनाच्च सिद्धविद्याधरार्यमुनिविप्रगणे वसिष्ठम् । मौनप्रप्राणमभितः प्रविशत्यशब्दं सोपांशु गौरववता सह जातवाक्ये ॥ २५ ॥ उन्निद्रकोकनदकोमलकोशकृष्टमग्नालिजालमकरन्दसुवर्णरागैः । आपिङ्गले मरुति वाति विलोलघण्टाटांकारगीतविनिपीतनिशान्तगीते ॥ २६ ॥ अगुरुतगरधूमे चन्दनामोदमिश्रे सरसकुसुमदामोद्दामगन्धाङ्किताभ्रे । सरति सति वितानाम्भोरुहामोदलेशैश्चलकुसुमरजोङ्के शब्दविज्ञातभृङ्गम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

झूल रहे बड़े-बड़े फूलों के झूलों से खूब अधिक सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द वायु बह रहा था, झरोखों पर लगे हुए कोमल बिछौनों पर, जिनमें फूल बिखेरे थे, बैठी हुई महिलाएँ देख रही थी, झरोखों से आई हुई सूर्य की किरणों से चकाचौंध होने के कारण चंचल नेत्रवाली मणियों की प्रभा से पीली और सुकुमारी, सफेद चवर धारण करनेवाली वे चंचल नारियाँ चपलता का त्यागकर चुपचाप खड़ी थी, विविध प्रकार के रत्नों से जड़े हुए आंगनों के मोतियों के प्रतिबिम्ब के तुल्य सूर्य की किरणों के राग से युक्त मध्यवाले यानी नाना पुष्पों के आकार में चित्रित होने पर, ये फूल नहीं हैं किन्तु प्रातःकाल के धूप के प्रतिबिम्ब हे, इस भ्रान्ति से भरे पुष्पराशि का ग्रहण नहीं कर रहे थे, अतएव पृथिवी का स्पर्श न होने से आकाश में मेघ के समान मँडरा रहे थे, उस सज्जनों के समाज में पूजनीयजन, पूर्वसंचित पुण्यों से श्रीवसिष्ठजी के मुख से निकला हुआ जो वचन सुना था, हृदय में उस वचन के विस्तार द्वारा बड़े आश्चर्य के साथ बहुत गुण-गणों से सुन्दर, कोमल पदावलियों से मनोहर अभीष्ट वाक्य आपस में कह रहे थे, दिशाओं से, नगर से, आकाश से और वन से आये हुए सिद्ध, विद्याधर, श्रेष्ठ मुनिगण और ब्राह्मणवृन्द श्रीवसिष्ठजी को चारों ओर से मौनपूर्वक प्रणामकर चुपचाप प्रवेश कर रहे थे, तदनन्तर जिनके साथ अवश्य सम्भाषण करना चाहिये, ऐसे गौरवशाली पुरुषों के साथ अतिमन्द स्वरसे कान के पास बातें कह रहे थे, खिले हुए रक्त कमलो के कोशों से निकले हुए, पहले उनके अन्दर डूबे हुए भौरों, पुष्परस ओर पुष्पराग के रंग से कुछ पीले रंगवाले तथा घर में लगी हुई वायु के धक्के से चंचल घण्टियों के शब्द से जिसने घरों के अन्दर होनेवाले गीतों को तिरस्कृत कर दिया था, ऐसा वायु बह रहा था, चन्दन की सुगन्ध से मिश्रित, फूल के चंचल पराग से युक्त अतएव ताजे फूलों की उत्कट सुगन्ध से मेघों को सुगन्धित करनेवाले अगर और तगर के धुएँ, शामियानों में वेधे हुए कमलो की सुगन्ध के साथ जिस बहने में शब्द होने के कारण भँवरों की प्रतीति हाती थी, यों बह रहे थे