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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 28

सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त अद्भाईसवां सर्ग बलि को निश्चेष्ट देखकर दुःखित हुए दानवो द्वारा शुक्राचार्यजी का स्मरण और उनका बलि की स्थिति कहकर दानवों का शोक दूर करना ।

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  1. Verses 1–7श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर बलि के अनुचर वे दानव लोग स्फटिक के…
  2. Verses 8–9राजा बलि का दर्शन कर अवश्य कर्तव्य प्रणाम आदि कर चुके वे महाअसुर बलि के प्राणों का सन्देह…
  3. Verses 10–13चिन्तन के पश्चात दैत्यों ने कल्पित (०३) दैदीप्यमान भार्गव का शरीर प्राप्त हुए गन्धर्वनगर…
  4. Verse 14हे दैत्य लोगों, सिद्ध हुआ यह रेश्वर्यशाली बलि अपने विचार से ही विमल पद को प्राप्त हुआ है…
  5. Verse 15हे दानवश्रेष्ठ, इसलिए यह ऐसे ही समाधि में स्थित होकर निरतिशयआनन्दरूप आत्मा में चिरस्थिति…
  6. Verse 16चिरकाल से थका हुआ-सा यह चित्त भ्रान्तिरहित होकर विश्राम को प्राप्त हो रहा है। इसका संसारर…
  7. Verse 17जैसे पृथिवी पर रात्रि के अन्धकार, निद्रा आदि के शान्त होने पर दिन को सूर्य का किरणसमूह प्…
  8. Verse 18समय आने (२७) शुक्राचार्यजी के द्वारा ही, जो सप्तर्षियों की सभा में गये हुए थे, योगबल से ब…
  9. Verse 19हे दानवनायकों, आप सब लोग राज्य-कार्य करो, बलि एक हजार वर्ष में समाधि से प्रबुद्ध होगा
  10. Verses 20–21गुरु के ऐसा कहने पर जैसे वृक्ष सूखी हुई मंजरी का त्याग करते हैं वैसे ही वहाँ पर दैत्यों न…
  11. Verse 22उस समय बाहर से आये हुए मनुष्य नागादि ने क्या किया ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं। मनुष्य प…