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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 23, Verses 1–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 23, verses 1–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 1-9

संस्कृत श्लोक

विरोचन उवाच । अस्ति पुत्रातिविततो देशो विपुलकोटरः । त्रैलोक्यानां सहस्राणि यत्र मान्ति बहून्यपि ॥ १ ॥ यत्र नाम्भोधयो नापि सागरा वा न चाद्रयः । न वनानि न तीर्थानि न नद्यो न सरांसि च ॥ २ ॥ न मही नापि चाकाशं न द्यौर्न पवनादयः । न चन्द्रार्कौ न लोकेशा न देवा नच दानवाः ॥ ३ ॥ न भूतयक्षरक्षांसि न गुल्मा न वनश्रियः । न काष्ठतृणभूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ४ ॥ नापो न ज्वलनो नाशा नोर्ध्वं नाधो न विष्टपम् । न लोको नातपो नाहं न हरीन्द्रहरादयः ॥ ५ ॥ एक एवास्मि सुमहांस्तत्र राजा महाद्युतिः । सर्वकृत्सर्वगः सर्वः स च तूष्णीं व्यवस्थितः ॥ ६ ॥ तेन संकल्पितो मन्त्री सर्वसन्मन्त्रणोन्मुखः । अघटं घटयत्याशु घटं विघटयत्यलम् ॥ ७ ॥ भोक्तुं न किंचिच्छक्नोति न च जानाति किंचन । राजार्थं केवलं सर्वं करोत्यज्ञोऽपि सन्सदा ॥ ८ ॥ स एव सर्वकार्यैककर्ता तस्य महीपतेः । राजा केवलमेकान्ते स्वस्थ एवावतिष्ठते ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

समा सकते हैं, जहाँ पर न जलाशय हैं, न समुद्र हैं, न पर्वत हैं, न वन हैं, न तीर्थ हैं, न नदियाँ हैं, न तालाब हैं, न पृथ्वी है, न आकाश है, न अन्तरिक्ष है, न वायु आदि है, न चन्द्रमा और सूर्य हैं, न लोकपाल हैं, न देवता हैं, न दानव हैं, न भूत, यक्ष और राक्षस हैं, न झाड़ियाँ हैं, न वन की विविध शोभाएँ हैं, न स्थावर और जंगमरूप काठ, तृण और प्राणी हैं, न जल है, न अग्नि है, न दिशाएँ हैं, न ऊर्ध्वभाग है, न अधोभाग है, न लोक हैं, न आलोक है, न धूप है और न विष्णु, इन्द्र, शिव आदि हैं। वहाँ पर अकेला वही महातेजस्वी राजा (आत्मा) है। वह सर्वकर्ता, सर्वव्यापक ओर कूटस्थ है। उसने सब सन्मन्त्रणाओं मे तत्पर मन्त्री का (मन का) संकल्प किया, वह आत्मा की अत्यन्त असंभव संसारिता का भी शीघ्र निर्माण करते हँ । आत्मा की अत्यन्त उपपन्न पूर्णानन्दैकरसता भी नहीं प्रतीत होती हैं, यों अपलाप करता हे । स्वयं जड होता हुआ भी केवल राजा के लिए सब कुछ सदा करता हे, वह कुछ भी भोग नहीं करता ओर कुछ भी नहीं जान सकता। उस राजा के सब कार्यो का एकमात्र कर्ता वही है, राजा तो केवल अद्वितीय स्वभाव में स्वस्थ होकर ही स्थित रहता है