Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 5
चौथा सर्ग समाप्त पॉँचवाँ सर्ग भृगु ऋषि के समाधिस्थ होने पर पर्वत पर खेल रहे शुक्राचार्य के, अप्सरा को देखने पर, मोहवश प्राप्त अप्सरोभाव का वर्णन |
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, आप सकल धर्मो के ज्ञाता हैँ, पूर्वापर के ज्ञाताओं में सर्…
- Verse 2हे पुण्यचरित, प्रकाश हो रहा यह विशाल संसार जैसे मन मेँ स्फुरित होता है वैसे स्पष्ट दृष्टा…
- Verse 3पूर्वोक्त एन्दव आदि के जगत ही इसमें दृष्टान्त हैं, ऐसा कहते हुए श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते ह…
- Verse 4इन्द्रजाल से व्याकुल चित्तवाले राजा लवण को जिस प्रकार चण्डालत्व प्राप्त हुआ था वैसे ही यह…
- Verses 5–18शुक्राचार्य का उपाख्यान का भी यहाँ पर दष्टान्तरूपसे उपक्षेप करते है । जैसे शुक्राचार्य की…
- Verse 19शुक्राचार्यजी अप्सरा को देखने के पश्चात कामदेव के बाणो से घायल हुए मनको यथाशक्ति विवेक द्…