Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 5, Verses 5–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 5, verses 5–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 5-18
संस्कृत श्लोक
भार्गवस्य चिरं कालं स्वर्गभोगबुभुक्षया ।
यथा भोगाधिनाथत्वं संसारित्वं बभूव च ॥ ५ ॥
भोगेश्वरत्वं च यथा तथेदं मनसि स्थितम् ।
श्रीराम उवाच ।
भगवन्भृगुपुत्रस्य स्वर्गभोगबुभुक्षया ॥ ६ ॥
कथं भोगाधिनाथत्वं संसारित्वं बभूव च ।
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
श्रृणु राम पुरा वृत्तं संवादं भृगुकालयोः ॥ ७ ॥
सानौ मन्दरशैलस्य तमालविटपाकुले ।
पुरा मन्दरशैलस्य सानौ कुसुमसंकुले ॥ ८ ॥
अतप्यत तपो घोरं कस्मिंश्चिद्भगवान्भृगुः ।
तमुपास्ते स्म तेजस्वी बालः पुत्रो महामतिः ॥ ९ ॥
शुक्रः सकलचन्द्राभः प्रकाश इव भासुरः ।
भृगुर्वनवरे तस्मिन्समाधावेव संस्थितः ॥ १० ॥
सर्वकालं समुत्कीर्णो वनोपलतलादिव ।
शुक्रः कुसुमशय्यासु कलधौताजिरेषु च ॥ ११ ॥
मन्दरोद्दामदोलासु बालो रमणलीलया ।
विद्याविद्यादृशोर्मध्ये शुक्रः प्राप्तमहापदः ॥ १२ ॥
त्रिशङ्कुरिव रोदोन्तरवर्तत तदाकुलः ।
निर्विकल्पसमाधिस्थे स कदाचित्पितर्यथ ॥ १३ ॥
अव्यग्रोऽभवदेकान्ते जितारिरिव भूमिपः ।
ददर्शाप्सरसं तत्र गच्छन्तीं नभसः पथा ॥ १४ ॥
क्षीरोदमध्यलुलितां लक्ष्मीमिव जनार्दनः ।
मन्दारमालावलितां मन्दानिलचलालकाम् ॥ १५ ॥
हारझाङ्कारिगमनां सुगन्धितनभोनिलाम् ।
लावण्यपादपलतां मदघूर्णितलोचनाम् ॥ १६ ॥
अमृतीकृततद्देशां देहेन्दूदयदीप्तिभिः ।
कान्तामालोक्य तस्याभूदुल्लसत्तरलं मनः ॥ १७ ॥
दृष्टनिर्मलपूर्णेन्दुवपुरम्बुनिधेरिव ।
साप्यालोक्य शुक्रमुखं तथा परवशा ह्यभूत् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
शुक्राचार्य का उपाख्यान का भी यहाँ पर दष्टान्तरूपसे उपक्षेप करते है ।
जैसे शुक्राचार्य की चिरकाल तक स्वर्ग के भोगो को भोगने की इच्छा से अप्सराओं के उपभोग में
स्पृहा, संसारिता (अप्सराओं के भोग के लिए स्वर्गादि गमनरूप जन्मान्तर) एवं स्वर्ग मेँ अप्सराओं का
भोग हुआ वैसे ही यह जगत मन में स्थित हे । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, महर्षि भृगु के पुत्र
शुक्राचार्य को स्वर्गीय भोगों को भोगने की इच्छा से अप्सराओं के उपभोग में स्पृहा ओर स्वर्गगमनरूप
अन्य जन्म कैसे प्राप्त हुआ ?
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, प्राचीन काल में मन्दराचल के शिखर पर, जो किं तमाल
के वृक्षों से खूब हरा भरा था, महर्षि भृगु ओर काल का जो संवाद हुआ था उसे आप सुनिये । प्राचीन
काल में मन्दराचल के विविध फूलों से व्याप्त किसी एक शिखर पर भगवान श्री भृगुजी कठोर तपस्या
करते थे । उनके पूर्ण चन्द्रमा के तुल्य सुन्दर, प्रकाश के समान देदीप्यमान, तेजस्वी, महामति पुत्र श्री
शुक्राचार्य, जो कि तव बालक ही थे उनकी सेवा-शुश्रूषा करते थे। महर्षि भृगु उस उत्तम वन में वहाँ के
पत्थर को काट-छाँटकर बनाई गई प्रस्तरमूर्ति के सदृश निश्चल हो सदा समाधि में ही स्थित रहते थे।
बालक शुक्राचार्य फूलों की शय्याओं में, चाँदी तथा सोने की वेदियों पर और मन्दाराचल के बड़े बड़े
हिंडोलों पर खेलते थे। उस समय शुक्राचार्य जैसे राजा त्रिशंकु द्युलोक ओर पृथिवी के मध्य में स्थित
हुए थे वैसे ही पारमार्थित आत्मतत्त्वदृष्टि और पामर आदि में प्रसिद्ध जगतसत्यतादुष्टि इन दोनों के
बीच में स्थित थे, अतएव वे राग आदि से व्याकुल रहते थे, किसी समय जब कि उनके पिता श्री भृगुजी
निर्विकल्प समाधि में बैठे थे, जिसने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली हो, ऐसे राजा के तुल्य वे
अन्य विषयों से अविक्षिप्त चित्तवाले हुए। वहाँ पर उन्होंने जैसे भगवान ने क्षीरसागर के मध्य से मन्थन
द्वारा उत्पादित श्री लक्ष्मीजी को देखा था वैसे ही क्षीरसागर के मध्य से मंथनपूर्वक उत्पादित आकाश
मार्ग से जा रही एक अप्सरा को देखा । वह मन्दार की मालाओं से विभूषित थी, मन्द-मन्द वायु से
उसके अलक हिल रहे थे, हार से उसका गमन झंकारसे पूर्ण था, उसने आकाशम वायु को सुगन्धित
कर दिया था, वह ऐसी सुन्दरी थी कि उसे यदि लावण्यरूपी वृक्ष की लता कहा जाय, तो कोई अत्युक्ति
न होगी, मद से उसके नेत्र चढ़े हुए थे तथा अपने शरीररूपी चन्द्रमा से उदित हुई किरणों से उसने उस
प्रदेश को अमृतमय कर दिया था। उस सुन्दर को देखकर शुक्राचार्य का मन, जिसने निर्मल पूर्ण चन्द्रमा
देखा हे, ऐसे समुद्र के शरीर के तुल्य उल्लास को प्राप्त हुआ ओर चंचल हुआ । वह अप्सरा भी शुक्राचार्य
का मुख देखकर वैसे ही परवश हुई (मोहित हुई )