Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 5, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 5, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यथैन्दवानां विप्राणां जगन्त्यवपुषामपि ।
स्थितानि जातदार्ढ्यानि मनसीदं तथा स्थितम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त एन्दव आदि के जगत ही इसमें दृष्टान्त हैं, ऐसा कहते हुए श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, जैसे स्थूल शरीर से रहित भी एेन्दव ब्राह्मणों के मन में
दृढता को प्राप्त अनेक जगत स्थित थे वैसे ही यह जगत मन में स्थित है