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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 34, Verses 35–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 34, verses 35–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

दामव्यालकटन्यायो मा ते भवतु राघव । एतद्राम पुरा प्रोक्तं पित्रा कमलजेन मे ॥ ३५ ॥ भवते यन्मया प्रोक्तं शिष्यायात्यन्तधीमते । दामव्यालकटन्यायस्तस्मान्मा तेऽस्तु राघव । भीमभासदृढन्यायो नित्यमस्तु तवानघ ॥ ३६ ॥ अविरलसुखदुःखसंकटेयं भवपदवी भवतापनोपयाता । व्यवहरणवतो विभूतियातौ सततमसक्ततयैव नश्यतीति ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे रघुवर, आपको दाम, व्याल और कट का न्याय प्राप्त न हो । हे श्रीरामचन्द्रजी, यह दाम आदि का वृत्तान्त मेरे पिता ब्रह्माजी ने पहले मुझसे कहा था । चूँकि आप मेरे प्रिय शिष्य तथा अत्यन्त बुद्धिमान है, अतः यह वृत्तान्त मैंने आपसे कहा है । इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, दाम, व्याल ओर कट की स्थिति आपकी न हो । हे अनघ, आपकी सदा भीम, भास ओर दृढ़ की स्थिति हो